आमुख
जो सर्वोपरि परमतत्त्व अनेक ब्रह्मांडो की उत्पत्ति नियमन एवं प्रलयकर्ता हैं उन्हें हम भगवान, परमात्मा वा परमेश्वर कहते हैं। इस हकीकत का स्वीकार आधुनिक विज्ञान भी करता है। उस परमतत्त्व में संलग्न होना परम योग है। जिसके हेतु कई मार्ग दर्शित किये गये हैं, परंतु वास्तविक, सरल एवं सर्वग्राह्य मार्ग तो स्वयं भगवान या उनके संग एकात्मरूप से संलग्न हुए मुक्त पुरुष ही दर्शित कर सकते हैं। इस कथन की यथार्थता इस पुस्तिका के पठन से सहज ही ज्ञात होगी।
श्री स्वामिनारायण महाप्रभु द्वारा उपदेशित पंचनियम (पंचमहाव्रत) जिसकी समझ इस पुस्तिका में विस्तृतरूप से दी गई है, इसका पालन मात्र प्रभु प्राप्ति ही नहीं किंतु हरेक व्यक्ति एवं समाज के सर्वोत्तम निर्माण हेतु तथा जगत के सामान्य सुख-शांति हेतु अनिवार्य है। अगर यह समझ में आए तो श्रीहरि के सर्वजीवहितावह आदेशों का पालन-प्रवर्तन सर्वत्र हो जाए, यह हरेक मनुष्य का परम कर्तव्य होना चाहिए। अगर हरेक मानवी के जीवन में ताने-बाने की सदृश बुन जाए तो वर्तमानकाल में प्रवर्तित अशांति एवं अव्यवस्था दूर हो कर, सर्वत्र शांति एवं व्यवस्था प्रस्थापित हो जाएगी, ऐसा इस पुस्तिका के पठनोपरांत अवश्य ही लगेगा।
सर्वोच्च परमपद की प्राप्ति एवं मानवी का सुमेल उभय की प्राप्ति साथ-साथ हो ऐसा सरल मार्ग क्यों न अपनायें? जिससे इस राह पर चलकर विश्व में निवासित सर्व मनुष्य परस्पर के सहयोग द्वारा विकास करे, ऐसी श्रद्धा सहित यह पुस्तिका प्रकाशित करते हैं।
अंततः श्री स्वामिनारायण भगवान के प्राकट्य के दिन ही यह पुस्तिका प्रकट होती है यह एक सुभग अवसर है। आशा है, अधिकाधिक लोग इससे लाभांवित होंगे एवं निज जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्रज्वलितकर अपार्थिव शांति का अनुभव करेंगे-करवायेंगे।
सं. 2063, महा वद चौदश
ई. स. 2007, 16 फरवरी
प्रकाशन समिति
श्री स्वामिनारायण डिवाइन मिशन अमदावाद