३. पंच नियम
अब वह पंच नियम को क्रमशः विस्तापूर्वक समझें :
प्रथम नियम : दारू त्याग
तन-मन-इंद्रियों को नशा करवाकर प्रभु की राह से चलित करे वे सर्व दारू है। विभिन्न प्रकार की मदिरा तथा चाय, कॉफी, सिगारेट, बीडी, तम्बाकु, अफीन, गाँजा, भंग आदि मादक पदार्थ एक या अन्य प्रकार के दारू ही हैं। ये सर्व पदार्थ शरीर के स्वास्थ्य को निम्नाधिक रूप से हानिकर्ता हैं, कई बार प्राणनाशक होने के कारण सदैव त्याग करें। दस इंद्रियाँ अर्थात् पांच कर्मेन्द्रियाँ (वाक, हस्त, पैर, गुदा एवं प्रजनेन्द्रिय) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (नेत्र, श्रोत्र, रसना, घ्राण एवं त्वचा) को नशा करवाकर ईश्वरप्राप्ति के विवेक के संधान को चलित कर दे वे सर्व दारू हैं। दृष्टिगोचर न करने योग्य वस्तुओं के प्रति आकर्षण हो, उस पर दृष्टिपात करने का प्रलोभन हो वह नेत्र का दारू है। व्यर्थ ग्राम्यवार्ता या किसी की निंदा-टीका करना या किसी को गाली देना यह वाणी की मदिरा है। किसी व्यक्ति की निंदाजनक बाते श्रवण करना, न श्रवण करने योग्य गीत वा वार्ता का श्रवण करना, ये सर्व श्रोत्र का दारू है, रजोगुणी तथा तमोगुणी वृत्ति उत्पन्न करनेवाले अतिशय खट्टे, नमकीन, तीखे, मीठे स्वादिष्ट पदार्थ खाने की इच्छा होना रसना इंद्रिय का दारू है। भगवान के संबंध के बिना रजोगुणी सुगंधित इत्तर-तेल इत्यादि द्रव्यों के उपयोग की आदत होना घ्राणेन्द्रिय का दारू है। भगवान के अतिरिक्त जगत संबंधित व्यर्थ विचार या विचार-संकल्प का चिंतन-मनन करना यह मन का दारू है। परस्त्री का संग, जुआ, शिकार करना, मदिरापान, नृत्य-संगीत-साज की आदत, व्यर्थाटन, निंदा तथा दिन की निद्रा - ये दस व्यसन हमारी वृत्ति को भगवद्स्वरूप में संलग्नित करने में बाधक हैं। रजोगुणी एवं तमोगुणी जीवन भी मदिरा सदृश है। मन-इंद्रियों को पंचविषय रूप नशा करवाये वे सभी दारू के भिन्न-भिन्न प्रकार हैं, जिनका स्वेच्छा से समझदारीपूर्वक त्याग, प्रथम वर्तमान है।
द्वितीय नियम : आमिष (हिंसा) का त्याग
आमिष त्याग अर्थात् मात्र सामिषाहार का ही त्याग नहीं, परंतु आंतर-बाह्य आहारशुद्धि का जतन है। आमिष के त्याग में मन-कर्म-वचन द्वारा हिंसा का संपूर्ण त्याग समाविष्ट हो जाता है। बिना स्वच्छ किये, जंतुयुक्त अनाज, फल, मेवे आदि पदार्थ तथा जंतुयुक्त बिना छने जल-दूध-तेल-घी इत्यादि तरल पदार्थ का उपयोग एक प्रकार का सामिषाहार है। वे सर्व पदार्थ जीव-जंतु रहित हो ऐसे स्वच्छकर ही प्रयोग करें। बाजार की अनाज चक्की का प्रयोग इच्छनीय नहीं है, अगर संभव हो तो आर्थिक अनुकुलताकर घर में चक्की बसा लें, उसका प्रयोग करें। आपत्तिकाल के सिवा शंकाशील औषध कभी न प्रयोग करें। मांस के संसर्गवाले वा अशुद्ध बाहरी खाद्य पदार्थ का कदापि प्रयोग न करें। किसी को दुभाकर, छलकर अन्याय द्वारा प्राप्त धन द्वारा खरीदा हुआ अन्न आमिष तुल्य ही है उसका ग्रहण न करें। आंतर-बाह्य शुद्धि के नियमानुसार निर्मित भोजन का थाल भगवान को अर्पण करें, महाप्रभु की स्मृति सहित भोजन करें यही वास्तविक रूप से आमिष का त्याग कहा जाता है।
अब आमिष के सूक्ष्म स्वरूप की विचारणा करें। किसी को हानि पहुँचाना, दुभाना, क्रोध करना भी आमिष है। निज स्वार्थ हेतु अन्य को पीडाकारी होना हिंसा है। ईर्ष्या-द्वेष मिथ्या भाषण या किसी के प्रति बुरा संकल्प करना, शक्ति मर्यादा से अधिक परिश्रम करना ये सभी हिंसा के विभिन्न प्रकार ही हैं। इस प्रकार स्थूल तथा सूक्ष्म सर्व प्रकार की हिंसा का त्याग अर्थात् अहिंसा का पालन द्वितीय नियम है।
तृतीय नियम : चोरी का त्याग
किसी भी पदार्थ फल-फूल, धन-जमीन आदि के स्वामी की आज्ञा बिना लेना चोरी है। किसी को दुभाकर या युक्तिपूर्वक या जबरदस्ती उससे छीन लेना चोरी है। स्वयं की आय तथा प्राप्त समय में से प्रभु को अर्पण करने का हिस्सा (धर्मदान) न निकालना भी चोरी है। किसी का विश्वासघात करना भी चोरी है। नौकरी-व्यवसाय में स्वयं के कर्तव्य-जिम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक न करना भी चोरी है। स्वयं के उद्देश्य हेतु महान पुरुष के नाम का दुरुपयोग करना भी चोरी है। किसी ने प्रेमभाव या महिमा सहित दिया पदार्थ भेंट, आसक्ति या लोभवृत्ति से स्वीकारना भी नियम का लोप है। इस प्रकार मन-कर्म-वचन द्वारा सर्व प्रकार से स्थूल-सूक्ष्म चोरी जाने-अनजाने भी न हो जाए उसके हेतु जागृति रखें यह तृतीय नियम है।
चतुर्थ नियम : व्यभिचार त्याग
व्यभिचार त्याग अर्थात् मन-कर्म-वचन द्वारा व्यभिचार का त्याग-परस्त्री पुरुष के अनिष्ट व्यवहार का त्याग अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन चौथा नियम है। परमेश्वर के स्वरूप में चर्या ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य की ऐसी स्थिति को प्राप्त पुरुष को स्त्री का तथा स्त्री को पुरुष का आकर्षण टल जाता है। इंद्रियो की विषयासक्त वृत्ति का जाने-अनजाने स्थूल या सूक्ष्म रीति से निग्रह न होकर जागृत या स्वप्न अवस्था में ब्रह्मचर्यव्रत का भंग हो जाए वह व्यभिचार है। मन में उद्भवित होती काम वृत्ति को बलात् दबा देने से मनोवैज्ञानिक विकृति या अन्य कमजोरी उत्पन्न होती है, परंतु ज्ञान-ध्यान-उपासना, सद्प्रवृत्ति, सद्वाचन तथा सत्पुरुष की सेवा-समागम द्वारा उन विकारी वृत्ति का सात्विक वृत्ति में रूपांतर कर, उसका उर्ध्वीकरण करने से सर्वोपरि प्रभु के स्वरूप का साक्षात्कार करने की पात्रता आती है। अतिरेक का त्यागकर जप, तप, देहदमन, पूजा-पाठ, स्वाध्याय, सेवा-भक्ति आदि करना, यह सभी पात्रता तथा निष्काम नियम की दृढता हेतु ही हैं। संतान की आवश्यकता न हो तो गृहस्थाश्रमी ब्रह्मचर्य नियम का पालन कर, भगवान के भजन-भक्ति तथा सेवा के कार्य में संलग्न हों। त्यागी-गृही, स्त्री-पुरुष स्वयं के धर्म-नियम-मर्यादा में सावधानी पूर्वक प्रभु के स्वरूप में ओतप्रोत होकर संलग्न होने का नित्य अभ्यास रखें। ब्रह्मानंदस्वामी ने कहा है कि ‘रसबस (ओतप्रोत) होई रही रसिया संग, ज्यूं मिसरी पय माही’ कृपासाध्य प्रभु की कृपा से सदैव इस स्थिति में वर्तन हो तब ‘चौथे नियम’ का संपूर्ण पालन हुआ माना जाए।
पंचम् नियम : दुषित न होना तथा न करना
‘न होना तथा न’ अर्थात् वाणी, विचार तथा वर्तन की आंतर-बाह्य शुद्धि का जतन करना-करवाना। जिसकी क्रिया अशुद्ध हो, जो स्वच्छता के आवश्यक नियम का पालन न करते हों, जिनके आहार-विहार अनिच्छनीय तथा अशुद्ध हों अर्थात् जो मांसाहारी, दारू का व्यसनी तथा चरित्रहीन हों, जो भगवद् आज्ञा का लोप करते हों ऐसे सर्व मनुष्य के हाथ के अन्नजल ग्रहण न करें। अनिवार्य संजोग के सिवा ऐसे मनुष्य के स्पर्श का त्याग करें, अगर करना पडे अथवा हो जाए तो घर आकर शुद्धि हेतु स्नान करें। बहनों को हर माह ऋतुकाल प्राकृतिक रूप से होता है शारीरिक शास्त्र के अनुसार रजस्त्राव की अशुद्धि तीन दिन तक रहती है। ऋतुस्त्राव के उपरांत चौथे दिन स्नानकर शुद्धि होती है। उस समय में आराम एवं संयम अति आवश्यक है। इन सभी दृष्टि से रजस्वला बहन स्वेच्छा से तीन दिन घर में कहीं स्पर्श न करें। रजोदर्शन के पालन का इस नियम में समावेश होता है। हमारा अशुद्ध वर्तन हमारे संपर्क में आनेवाले व्यक्ति के तनमन को दूषित किये बिना नहीं रहता। अतः स्वयं हमारे तथा अन्य के हित में हमारा वर्तन तथा हमारी वाणी निर्मल, सत्यमय तथा अनुकरणीय होनी चाहिये। यह बात हमें पाँचवा नियम आग्रहपूर्वक सिखाती है।
इस प्रकार पंचनियम मानवजीवन के हरेक क्षेत्र में तथा समाज के रोम-रोम में प्रवेश करने आवश्यक हैं। यह आदर्श प्रत्येक मनुष्य का खुद स्वभाव होना चाहिये। इस प्रकार हम पंच नियम हेतु जब विश्वव्यापी आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करेंगे तब वह इस समय से अनेक गुना अधिक कल्याणकारी बनेगा।
एक बात स्मरण में रहे कि पाँचो नियम एकदूसरे के संग संकलित होने के कारण एक के आंशिक लोप से अन्य नियम का न्यूनाधिक अंश लोप होता है। अतएव अविरत रूप से जीवन निर्माण नहीं होता एवं सर्वोच्च ध्येय की प्राप्ति संभवित नहीं होती। अतः पाँचो नियम का पूर्णतः पालन हो यह अत्यंत आवश्यक है।
उपर्युक्त पंचनियम में संयोगानुसार कोई फर्क हो तो आत्मनिरीक्षण कर, महान पुरुष का मार्गदर्शन प्राप्तकर दोषमुक्त हों, फलतः परमपद की प्राप्ति के हेतु आंतरशुद्धि की वृद्धि होती रहे।