५. वास्तविक त्यौहार मनाना किसे कहें?
प. पू. बापाश्री के प्राकट्य को संवत 2050 के कार्तिक शुकल एकादशी तारीख : 24-11-1993 को 150 वाँ वर्ष लगा, अतः यह सार्ध शताब्दी वर्ष हुआ। महाप्रभु के परमपद की प्राप्ति के हेतु आशीर्वादरूप इस वर्ष को कैसे मनाये इसका विचार करेंः
वास्तविक रूप से मनाना उसे ही कहा जाए जो समस्त जीवन को स्पर्श करे। हमारे उर्ध्वीकरण के मार्ग को संपोषित करे, इस प्रकार इस वर्ष को मनाना चाहिए। यह सर्वजीवहितावह ब्रह्म यज्ञ किसी भी जाति की सीमा से पर सर्व मनुष्य के लिये आत्यंतिक मोक्ष का महायज्ञ है।
अनादिमुक्त की दुर्लभ स्थिति की प्राप्ति कराना ही बापाश्री के जीवन का महत्तम उद्देश्य था। उसे आत्मसात् करने हम सभी कटिबद्ध हो जाएँ।
उसके लिए प्रस्तुत है प्रेरणारूप रचनात्मक कार्यक्रम :
(1) पंचनियम का पालन : बापाश्री के कथनानुसार ‘अगर महाराज के वचन से बाहर हो अर्थात् नियम में फर्क हो तो बडा विमुख कहा जाए।’ अतः श्रीहरि के पंचनियम महान मुक्त के योग-समागम द्वारा समझकर, जीवन के अंगरूप बनाये, शूरवीर होकर सदैव जागृत एवं प्रयत्नशील रहें।
(2) पूजा-अर्चन : आत्मिक उन्नति एवं शांति हेतु हररोज श्रीहरि की बाह्य तथा मानसी पूजा परिशिष्ठ में दर्शित अनुसार नियमितरूप से करें।
(3) दैनिक गृहसभा : पारिवारिक आंतर-बाह्य विकास हेतु निज परिवार के सर्व सभ्य मिलकर स्वयं के घर में हररोज कम से कम आधा घंटा अगर शक्य हो तो अधिक समय गृहसभा का आयोजन करें। उस सभा के कार्यक्रम में नंद संतो द्वारा रचित श्रीहरि की मूर्ति के तथा ज्ञान-ध्यान-भक्ति से संलग्नित कीर्तन के पदों का गान, वचनामृत आदि ग्रंथ की कथा, विवेचन, नित्यनियम, धून, ध्यान आदि मुद्दे को समय मर्यादा अनुसार समाविष्ट करें।
(4) कीर्तन मुखपाठ : परिवार के हरेक सभ्य इस वर्ष दौरान निज पसंद के कम से कम पाँच या अधिक कीर्तन कंठस्थ करें। हररोज चलते-फिरते, उठते-बैठते सर्व क्रिया करते, श्रीहरि के स्वरूप की स्मृति रखकर, तालबद्धरूप से उन कीर्तनों का गान करें। कीर्तन भक्ति से श्रीहरि की मूर्ति अंतःकरण में अंकित हो जाती है।
(5) ‘वचनामृतम्’ आदि ग्रंथो का अभ्यास : ‘वचनामृतम्’ श्री स्वामिनारायण भगवान के मुखकमल की दिव्य परावाणी है। बापाश्री के कथनानुसार ‘वचनामृत सद्दश कोई शास्त्र नहीं है।’ वह जीवों के अज्ञानरूप तिमिर का नाशकर, आत्मा-परमात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार करवाता है। उनके रटन से श्रीजीमहाराज की मूर्ति के आनंद का अनुभव होता है। वह आनंद अहर्निश विद्यमान हो, उसके हेतु परिवार के सभी सदस्य वचनामृत का पठन-श्रवण समझदारीपूर्वक प्रतिदिन करें। निज पसंदानुसार पाँच या अधिक वचनामृत कंठस्थ करें। सत्संगिजीवन, शिक्षापक्षी-रहस्यार्थ, भक्तचिंतामणी आदि ग्रंथो का भी अभ्यास करें।
(6) थाल-(भोग के हेतु भोजन सामग्री) आरती : थाल प्रभु के प्रति समर्पण भावना का प्रतीक है आरती के समय आंतरप्रकाशित होकर श्रीहरि का दर्शन अंतर में अंकित होता है, तथा अंतरिक्ष में उपस्थित देव भी प्रभु के दर्शन से लाभांवित होते हैं। प्रत्येक परिवार दिन में सुबह-शाम दो बार श्रीजीमहाराज की मूर्ति को थाल धरायें तथा आरती करें। समय की परवाह न करते हुए थाल-आरती पूर्णतः बोलें। थाल-आरती के समय संभव हो तो परिवार के सर्व सभ्य हाजिर हो सके ऐसा आयोजन करें। थाल-आरती के पद परिवार के हरेक सभ्य को कंठस्थ हो यह अति आवश्यक है।
(7) जप :श्री वृषपुर (कच्छ) बापाश्री की छत्री संस्था, सरसपुर श्री स्वामिनारायण मंदिर, अहमदाबाद तथा श्री स्वामिनारायण डिवाइन मिशन, नारणपुरा, अहमदाबाद द्वारा ‘श्री स्वामिनारायण’ महामंत्र की लेखनपोथीयाँ मुद्रित की गई है। ये उपरोक्त तीनों संस्था से विना मूल्य मिल सकती है। विद्यार्थीयों को छुट्टियों में उत्कृष्ट प्रवृत्ति मिलेगी तथा उससे आंतरिक उर्ध्वरोहण भी होगा। प्रत्येक परिवार कम से कम एक या अधिक महामंत्र की लेखनपोथी लिख सकता है। लिखकर पूर्ण होने पर पोथी उपरोक्त किसी भी स्थान से पावती लेकर लौटा सकते है। उपरांत स. गु. श्री गोपालानंदस्वामी रचित लोकमंगल मंत्र’ तथा ‘जनमंगल स्तोत्र’ के जप-पाठ स्थिर आसन पर बैठकर वा अन्य प्रवृत्ति करते हुए कर सकते हैं। श्री स्वामिनारायण’ नामक मंत्र सभी रोगों की औषधि है; सकल व्याधिहर औषधि है। मंत्रोच्चार से निम्न कोटी के दैवी तत्त्व तथा अंतरिक्ष में निवासित या भूमि पर के दुष्ट तत्त्व भाग जाते हैं।
(8) माला : माला श्रीहरि के सर्वोपरी स्वरूप में एकाग्र मन से संलग्न होने का अमोघ साधन है। भगवान के नाम के निम्नलिखित महामंत्र माला के प्रत्येक मनके में मन में बोलकर नित्य एक वा अधिक माला, श्रीजीमहाराज के दिव्य स्वरूप में स्थिर चित्त से संलग्न होकर घुमानी चाहिये :
1. 'ब्रह्माहम् स्वामिनारायणदासोऽस्मि'
2. 'श्रीजीमहाराज ने मेरे चैतन्य को कृपाकर मुक्तकर मूर्ति में रखा है। श्रीजीमहाराज ही हैं।'
ये दोनों मंत्र अनादिमुक्त की स्थिति की प्राप्ति हेतु हैं।
(9) ध्यान :वासना रहित वर्तन करना एकांतिक भक्त का धर्म है। वासना न हो वह एकांतिक भक्त है। सर्व स्थान से वासना तूटकर एक भगवद् स्वरूप में अचल मति होने का एकमात्र उपाय भगवान की कृपा है; भगवद् स्वरूप का ध्यान है। ध्यान कर्ता पर यह कृपा सहज ही होती है। अतएव श्रीजीमहाराज की मूर्ति नखशिखा पर्यंत चैतन्य में सिद्ध करने के हेतु परिवार का प्रत्येक सभ्य अनुकुलतानुसार ध्यान का अभ्यास प्रतिदिन नियमित रूप से अवश्य ही करें। महान मुक्त द्वारा ध्यान की रीति सिखकर, उसके अनुसार एकाग्र चित्त से ध्यान करें।
ध्यान की रीति के मुद्दें :
1. सर्वप्रथम हरेक ध्यानकर्ता व्यक्ति स्वयं को अति प्रिय तथा ध्यान में आये ऐसी श्री घनश्याम महाप्रभु की बैठी या खडी;खुले शरीर की (मंगला दर्शन की) या वस्त्र सहित की (श्रृंगार दर्शन की) मूर्ति निज संमुख रखें। उस ध्येय स्वरूप को बदले नहीं।
2. उस मूर्ति को नखशिख अर्थात् चरण से मस्तक पर्यंत एक चित्त से अवलोकन करें।
3. तदुपरांत मूर्ति के मुखारविंद के भाल, भ्रमर, नेत्र, नासिका आदि अंग स्वयं के नेत्र खोल-बंद कर, एकाग्रता से निरीक्षण कर दृढ करें जहाँ तक बहिर्दष्टि से (खुले नेत्र से) दृष्टिगोचर होते अंग अंतर्दष्टि से अंतःकरण में वैसे ही हुबहु दृष्टिगोचर हो तब तक धारणा करें।
4. इस प्रकार समग्र मूर्ति अंतर्दष्टि से निज अंतःकरण में दृढ करें।
5. नेत्रों को बंद करते ही बाहर के सदृश ही हुबहु मूर्ति अंतर्दष्टि से हंमेशा दृष्टिगोचर होनी चालु रहे तब तक इस प्रकार ध्यान करना चालु रखें।
6. इस प्रकार समग्र रूप से मूर्ति दृढ होने के पश्चात् ज्ञान द्वारा, स्वयं की देह के अस्तित्व को पूर्णतः भुलकर, उसके स्थान पर अधोउर्ध्व तेज के समूह के मध्य में दृढ हुई महाराज की मूर्ति को यथा जीव देह में विद्यमान है, उसी प्रकार मूर्ति में स्थित होकर दृष्टिगोचर करें।
7. उस समय श्रीजीमहाराज ने मेरे चैतन्य को मुक्त बनाकर मूर्ति में स्थित किया है, ऐसी भावना कर, मूर्ति में स्थित होते हुए, आत्मसत्ता से मूर्ति का निरीक्षण करें। यह प्रतिलोम ध्यान है।
8. इस प्रकार प्रतिदिन मूर्ति का प्रतिलोमरूप से ध्यान करते हुए मूर्ति के दिव्य सुख के आनंद का अनुभव, ज्यों-ज्यों पात्रता बढती जाएगी त्यों-त्यों अधिकाधिक होगा।
9. जब तक श्रीहरि के स्वरूप के संग रोम-रोम रसरूप एकता न हो अर्थात् अनादिमुक्त की स्थिति का अनुभव सहज ही न हो, तब तक तनिक भी आकुल-व्याकुल हुए बिना पूर्ण उत्साह एवं आनंद से ध्यान करना चालु रखें।
ध्यान की किसी भी प्रक्रिया दौरान उकताना या उलझन का अनुभव न करें। मूर्ति के प्रताप से ध्यान में विघ्नकर्ता विचार-संकल्प धीरे-धीरे समूल दूर हो जाएंगे तथा अहर्निश मूर्ति के आनंद की प्राप्ति होगी।
10. अनादिमुक्त की अलौकिक स्थिति की प्राप्ति के उपरांत नेत्र खुले हों वा बंद कोई फर्क नहीं पडता, क्योंकि उसके पश्चात् देह के अस्तित्व का संधान ही नहीं रहता। तत्पश्चात् श्रीजीमहाराज ही रहते हैं एवं चैतन्य दिव्य साकार स्वरूप प्राप्तकर, सेवकभाव से मूर्ति में ओतप्रोत रहकर नवीन-नवीन सुख का अनुभव करता है।
इस प्रकार, समय की अनुकुलताकर प्रतिदिन शांत स्थल, स्थिर आसन से बैठकर, नियमित ध्यान करें। उसी प्रकार मानसी पूजा भी नित्य प्रतिलोमवृत्ति से मूर्ति में रहकर, चलते-फिरते, खाते-पीते, उठते-बैठते या अन्य प्रवृत्ति करते हुए ध्यान कर सकते हैं। जब तक ध्येय सिद्ध न हो तब तक ध्यान का अभ्यास सानंद चालु रखें।
(10) महाग्रंथो की पारायण :हरेक परिवार इस वर्ष दौरान निम्नलिखित दो महाग्रंथो में से एक की पाँच पारायण श्रीहरि की मूर्ति की संलग्नता सहित समझदारीपूर्वक करें :
1. रहस्यार्थ प्रदीपिका टीका सह वचनामृत;
2. स. गु. मुनिस्वामी रचित ‘शिक्षापत्री रहस्यार्थ’ । वा निम्नलिखित पाँच ग्रंथो की एक-एक पारायण, कुल पाँच पारायण करें;
1. रहस्यार्थ वचनामृत;
2. शिक्षापत्री रहस्यार्थ;
3. बापाश्री की वार्ता भाग 1-2;
4. श्री अबजीबापाश्री का जीवनचरित्र या जीवन वृत्तांत;
5. स. गु. ब्रह्मचारी श्री निर्गुणानंदजी कृत ‘श्री पुरुषोत्तम लीलामृत सुखसागर’।
ऐसी पाँच पारायण की हो ऐसे परिवार बापाश्री के परम वरदान सदृश छत्री स्थान पर मनाये जाने वाले सार्ध शताब्दी महोत्सव दौरान उन पारायणों की पुरश्चरण विधि कार्यक्रम में बैठकर हिस्सा ले सकते हैं।
(11) धून :सर्वोपरि श्रीहरि के महामंत्र के नाम की धून आसपास के वातावरण को निर्मल, पवित्र एवं दिव्य बना देती है। अंतःशत्रुरूप त्रास उत्पन्न करनेवाले दोष का उस दिव्य ध्वनि के प्रबल प्रताप से शमन हो जाता है। इसके अतिरिक्त अवकाश में घूमती अशुभ वासनावाली प्रेतात्मा उस महामंत्र की झनकार से भयभीत होकर भाग जाती है; शुभ प्रेतात्मा उस दिव्य ध्वनि के श्रवण-स्पर्श से पावन होकर श्रीहरि के संकल्प से मोक्ष प्राप्त करती है। धून के दिव्य आंदोलन हवा में सर्वत्र प्रसरित होकर, जगत के मनुष्यों के पापों को भस्म कर, न्यून कर देते है; परिणाम स्वरूप विश्व में शांति प्रसरित होती है। धून की दिव्य शक्ति धून कर्ता के मनोरथ पूर्ण करती है। प्रभु प्राप्ति की अभिलाषा करते मुमुक्षुओं की पात्रता में वृद्धि करती है तथा ध्यान स्थिर वृत्ति से होने लगता है। अतः भिन्न-भिन्न ग्राम तथा शहर के विविध विस्तार में बारह, चौबीस, छत्तीस घंटे... की अखंड धून के कार्यक्रम की योजना करते रहते हैं; वर्तमान में यह कार्यक्रम चालु ही है। धून का प्रारंभ श्री छत्री स्थान से संवत 2050 के कार्तिक शुकल एकादशी से प्रारंभ हुआ है एवं गाँव-गाँव, शहर-शहर में योजित होकर, सं 2051 के कार्तिक शुकल एकादशी के दिन श्री छत्री स्थान पर ही समाप्त होगी। सार्ध शताब्दी महोत्सव समिति की ओर से उस समय 150 घंटे की धून के आयोजन के साथ वर्ष दौरान भिन्न-भिन्न स्थान पर हुई समस्त धून के कार्यक्रम का विधिवत् समापन होगा।
(12) सामूहिक सत्संग सभा : प्रत्येक गाँव के तथा शहर के विभिन्न विस्तार में निवासित हरिभक्त मंदिर में या अन्य अनुकुल स्थान में माह में एक, दो या चार बार अर्थात् मासिक, पाक्षिक या साप्ताहिक अनुकुलतानुसार समूह में एकत्र होकर सत्संग सभा का आयोजन करें। सभा के कार्यक्रम में मंगलाचरण-प्रार्थना, श्लोक, कीर्तन, वचनामृत-बापाश्री की वार्ता, भक्तचिंतामणि आदि ग्रंथो का बारी-बारी से पठन कर उस पर विवेचन, विद्वान संत-हरिभक्तों के नियत किये हुए प्रवचन, समापन वक्तव्य, धून, ध्यान, थाल, आरती, प्रसादवितरण इत्यादि को समाविष्ट कर सकते हैं। इस प्रकार करीब दो से तीन घंटे का सुंदर कार्यक्रम रखें सत्संग सभा में अधिकाधिक संख्या में हरिभक्त उपस्थित हों ऐसा संगीन आयोजन करें। सत्संग सभा के कारण संगठन एकता व परस्पर आत्मीयता होती है, इसके अतिरिक्त संत-हरिभक्तों के दर्शन-समागम-प्रवचन का अमूल्य लाभ प्राप्त होता है। सर्वाधिक विशेष महाराज की मूर्ति के संबंध का अपूर्व आनंद प्राप्त होता है।
(13) धर्मदान : श्रीजीमहाराज की आज्ञानुसार धनाढ्य परिवार निज आय का दशांश तथा आर्थिक तौर पर दीन एवं मध्यम परिवार आय का बीसांश धर्मदान पूर्णतः ठाकुरजी को अर्पण करें गृहस्थ हों वे दशांश-बीसांश निकाले यह कनिष्ठ धर्मदान है; बारह माह में एक माह महान मुक्त का समागम करें यह मध्यम धर्मदान है एवं श्रीजी की दिव्य मूर्ति में इंद्रियाँ, अंतःकरण तथा जीव एकाग्रकर संलग्न हो यह उत्तम धर्मदान है, बापाश्री के कथनानुसार सर्व गृहस्थ ये तीन प्रकार का धर्मदान करें, किंतु एक का भी त्याग न करें। हम सभी इसी प्रकार के वर्तन का निर्णय करें। जिससे श्रीजीमहाराज एवं बापाश्री की अनन्य प्रसन्नता प्राप्त हो। त्यागी वर्ग क्या कर सकता है? त्यागी की कोई वस्त्रादि से सेवा करे, उसे धर्मामृतानुसार रखे तथा उससे अधिक प्रतीत हो तो जिस मंदिर में निवास करते हों वहाँ ठाकुरजी के कोठार को अर्पित कर दे तो त्यागी ने धन अर्पित किया कहा जाता है। त्यागी-गृही दोनों ही निज धर्मानुसार श्री ठाकुरजी को नियमित रूप से धन अर्पण करें।
(14) अन्य महत्त्व के प्रकीर्ण मुद्दें : इस सार्ध शताब्दी वर्ष दौरान इतना विशेष तौर पर अवश्य ही करें कि -
(अ) हमस सब टी.वी. पर आते देश-विदेश के दैनिक समाचार तथा शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं धार्मिक कार्यक्रम के अतिरिक्त अन्य व्यर्थ कार्यक्रम को देखना वर्जित करें। इसके अतिरिक्त न देखने योग्य सिनेमा, नाटक, भवाई (नौटंकी), मेला, तमाशा आदि न देखें। बालक एवं किशोरों को यह बात आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक तरीके से समझ में आए ऐसी रीति से समझाने पर वे अवश्य ही समझेंगे व संमत होंगे।
(ब) नवरात्री के दिनों में घर के कोई भी सभ्य लौकिक गरबा-रास देखने-खेलने न जाते हुए उसके स्थान पर सर्व मिलकर ‘मध्य में’ श्रीहरिजी की मूर्ति बिराजमान कर प्रसंगोचित कीर्तन गान करवाकर गरबी-रास का आयोजन करें। जिससे श्रीहरि की प्रसन्नता की प्राप्ति होगी एवं रचनात्मक सात्विक प्रवृत्ति से सभी आनंदित हो सकेंगे।
(क) स्वयं के घर में श्रीजीमहाराज एवं उनके संत-मुक्तों के स्वरूप की प्रेरणादायक तस्वीरें तथा तीर्थस्थान, प्राकृतिक दृश्य, मंदिर, वैज्ञानिक खोज से संलग्नित कृतियाँ सुवाक्य के बोर्ड आदि दीवार पर सुशोभन के तौर पर या प्रेरणार्थ रखें तथा उनके आल्बम तैयार करें। असंस्कारी तस्वीरों को कदापि न टांगे वा न संचित करें।
इस महापर्व के उपलक्ष में हम सभी ऐसे कार्यक्रम अपनाकर कृतार्थ हों तथा हमारे संपर्क में आनेवाले व्यक्ति को उसकी पात्रता लक्ष में रखते हुए अनुसरण करने की प्रेरणा दे।
कविरत्न स. गु. ब्रह्मानंदस्वामी मानवजीवन के लक्ष्य बिंदु के लिये कहते हैं कि -
‘मरना-मरना सभी कहे, मरी न जाने कोई;
मरना तो ऐसा मरना फिर जन्म न होई ।’
इस ध्येय सिद्धि के हेतु परमकृपालु बापाश्री का कथन देखें :
‘जीव को महाराज के सुख की पहचान नहीं और सत्संग में सेवा करने योग्य न करने योग्य ऐसे संत-हरिजन की पहचान नहीं है। समागम करने योग्य तथा सेवा करने योग्य ऐसे संत-हरिजन को पहचानकर, उनका समागमकर, श्रीजीमहाराज की मूर्ति में संलग्न हो जाए तो सुखी हो जाए। भगवानका सुख तो श्रीजीमहाराज तथा उनके अनादि मुक्त द्वारा उनकी कृपा से ही प्राप्त होता है; केवल साधन के बल से प्राप्त नहीं होता, परंतु उस कृपा के अधिकारी बनने, पात्र होने का प्रयत्न तो स्वयं ही करना पडता है।’
अंततः श्रीजीमहाराज के अनादि मुक्तों के इन वचनों को जीवन में तथा व्यवहार में चरितार्थ करने का निष्ठापूर्वक पुरुषार्थ करें एवं उस पुरुषार्थ को सार्ध शताब्दी तक ही नहीं, परंतु सदैव समस्त जीवन का आनंदयोग बनायें। तथास्तु।