६. परिशिष्ट : बाह्य पूजाविधि
सूर्योदय से पूर्व उठकर श्री स्वामिनारायण भगवान तथा मुक्तों के नाम का उच्चारणकर, उनकी स्तुति-प्रार्थनाकर, उनका ध्यान करें, तत्पश्चात् बिछौने से उठकर प्रातः विधि करें। मलत्याग-शौचविधि के पश्चात् हाथ-पैर की समुचित शुद्धि करें। पश्चात् एक स्थान पर बैठकर, छने हुए जल से शुद्ध किया हुआ दतुवन करें, छने हुए जल से कुल्ला कर मुखशुद्धि करें। दतुवन करते हुए घूमना-फिरना बातें करना न करें। तत्पश्चात् शुद्ध जल से स्नान करें तथा उस समय भगवद्नाम का तथा तीर्थों के नाम का स्मरण करें। स्नान के पश्चात् धुले हुए वस्त्र पहनें। धोती पहनकर दुपट्टा या शाल ओढें। सुती धोती पहनने के पश्चात् पुनः धोकर पूजा में पहनें। रेशमी धोती धोये बिना पुनः पहन सकते हैं। मैले वस्त्र न पहनें। पूजा के हेतु शांत पवित्र स्थान पर पूर्णतः बैठ सकें ऐसे पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर मुख से बैठें। ये सर्व बाह्य शुद्धि के संग मन से भी पवित्र होकर प्रेमपूर्वक पूजा करें।
दाहिने हाथ की हथेली में शुद्ध-छना हुआ जल ग्रहण कर ‘ॐ श्री स्वामिनारायण नमः’ कहकर आचमन करें। पुनः हथेली में जल ग्रहणकर ‘ॐ श्री हरिकृष्णाय नमः’ कहकर आचमन करें। उसी प्रकार तीसरी बार हथेली में जल ग्रहणकर ‘ॐ श्री घनश्यामाय नमः’ ऐसा नाममंत्र बोलकर आचमन करें। उपरांत पुरुष भाल, छाती, दोनों भुजा के बाहु इस प्रकार चार स्थान पर प्रसादी के चंदन से ऊर्ध्वपुंड्र तिलककर उसमें कुमकुम या चंदन का टीका करें। सुहागिन स्त्री भाल में मात्र टीका करें। तिलक-टीका करते समय ‘स्वामिनारायण’ महामंत्र बोलें। तत्पश्चात् मानसी पूजा करें। भाव से रोमांचित होकर गद्गद् कंठ से की गई मानसी पूजा की श्रीहरिने प्रशंसा की है। अतः भाव से पूजा करें।
तत्पश्चात् श्री स्वामिनारायण भगवान की चित्र प्रतिमा को उत्तम आसन पर बिराजमान करवा कर आवाहन करें।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ हे नाथ! स्वामिनारायण! प्रभोः!।
धर्मसूनो दयासिंधो स्वेषां श्रेयः परं कुरु॥
आगच्छ भगवन्! देव! स्वस्थानात् परमेश्वर।
अहं पूजां करिष्यामि सदा त्वं संमुखो भव॥
यह आवाहनमंत्र प्रेमपूर्वक बोलकर आदर से नमस्कार करें। नैवेद्य-धूप-दीप-पूष्पादि अर्पण करें। पश्चात् मूर्ति संमुख दृष्टि रखकर ‘स्वामिनारायण’ महामंत्र का तथा ध. धु. आचार्य महाराजश्री के पास से लिये गये अष्टाक्षर दीक्षामंत्र का जप करें। जप की माला को गौमुखी के वस्त्र से ढाँककर एकाग्र चित्त से जप करें। तत्पश्चात् भगवान की प्रदक्षिणा करें। पुरुष साष्टांग दंडवत् तथा स्त्री पचांग प्रमाण करें। भगवान की आदरपूर्वक स्तुति-प्रार्थना कर
स्वस्थानं गच्छ देवेश! पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकाम प्रसिद्धयर्थं पुनरागमनाय च॥
यह विसर्जनमंत्र बोलें। पश्चात् ‘शिक्षापत्री’ का पाठ करें।
इस प्रकार श्रीहरिजी की पूजा के बाद व्यवहारिक कार्य में जुटें।