९. मुकाम नौवाँ : मन की अचिंत्य शक्ति

मन मानवी की अद्भूत शक्ति का केन्द्र है। इस जगत में ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसे मन द्वारा प्राप्त न किया जा सके। मन की शक्ति अगाध है। इसकी व्यापकता आकाश की सदृश अनंत है। इस संसार में असंभवित लगती घटनाएँ भी मन के द्वारा संभव हुई है और हो रही है। आंतरमन (Subconscious mind) और अंतरात्मा (Conscience) उभय के संयोजन से एक प्रचंड शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। यह अद्भूत और चमत्कारिक शक्तिसंयोजन कैसी भी मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति में परिवर्तन लाने में समर्थ होती है।

महाभारत में एक कथानक है। दीर्घतपा नामक एक ऋषि थे। उन्होंने एक बार एक निश्चित मुहुर्त में यज्ञ करने का संकल्प किया। यज्ञ के लिये आवश्यक समिध तथा फल-फूल लेने वे जंगल में गये, वहाँ अनजाने में एक बँझर कुएँ में गिर पड़े। कुएँ में से तुरंत बाहर निकलना मुश्किल था। किसी की मदद मिले और बाहर आए उससे पहले यज्ञ का निर्धारित मुहुर्तकाल आ गया। अतएव ऋ षि ने कुएँ में रहकर ही मानसिक यज्ञ किया एवं उन्होंने किया हुआ मानसिक यज्ञ देवताओं ने मान्य रखा। परिणाम स्वरूप यज्ञ की फलश्रुति के रूप में ऋ षि को देवता का पद प्राप्त हुआ। मन द्वारा किया गया कोई भी पुरुषार्थ स्थूल शरीर से किये गये किसी भी पुरुषार्थ की तुलना में अधिक जल्द एवं अचूक फल देता है। इसीलिये भगवान स्वामिनारायण ने भी मानसी पूजा को बाह्य स्थूल पूजा से अनेक गुना अधिक महत्व प्रदान किया है।

हररोज़ दिन में कुछ समय एकांत में बैठकर आत्मचिंतन करना चाहिये। मनमें आते विचार किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया किये बिना तटस्थ भाव से दृष्टिकृत करते रहे इस प्रकार नियमित रूप से दीर्घ काल पर्यंत करने से मन हमारा मित्र बन जाता है, यही नहीं मन से चिपके अहंभाव और अज्ञानता के आवरण दूर होने से अंतःकरण में आनंद और निःस्वार्थ प्रेम का प्राक्ट्य होता है। मन से, मन से परे स्थित चेतना का स्पर्श होता है, तब वह चेतना सचराचर विश्व में -सर्व में व्याप्त अनुभूत होती है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण में ब्रह्माजी महर्षि वसिष्ठ को कहते है: ‘देहधारी मनुष्य स्वयं की मन रूप देह से जिस प्रकार प्रयत्न करता है उसी प्रकार उसे फलसिद्धि प्राप्त होती है। स्थूल देह का कोई भी प्रयत्न सिध्ध् नहीं होता है, परंतु मन रूप देह का सर्व चेष्टित सफल होता है। मन सदैव पवित्र अनुसंधान स्मरण करे तो, जिस प्रकार चट्टान पर फेंके गये बाण निष्फल जाते है, उसी प्रकार उस पर किये गये जादू-टोना आदि अभिचार प्रयोग तथा श्राप निष्फल जाते है। मन जिसका अचूक अनुसंधान करे उसे कुछ क्षणों में प्राप्त कर सकता है। हे मुने, सर्व देहादि भाव मसल जाये तथापि मन द्वारा किया गया पुरुषार्थ निर्विघ्न फल देता है, क्योंकि पुरुषार्थ भी मन का ही भेद है ।’

मन जिस बात का स्वीकार करता है, वही होती है और मन जिस बात का स्वीकार नहीं करता वह कभी भी नहीं होती है। 13 के अंक को अंग्रेज मनहूस मानते है, तो 13 के अंक से संबंधित सभी बातें अशुभ ही होती है। जबकि हमारे यहाँ त्रियोदशी को बिन पूछा मुहुर्त माना जाता है। धनत्रियोदशी के दिन हमारे यहाँ लक्ष्मी पूजन जैसे शुभ कार्य होते है। जीवन में होती शुभ-अशुभ घटनाएँ हनारे मन की पैदाइश है, अतः मन में कभी भी भ्रामक मान्यताओं या वहम को भरना नहीं चाहिये। मन को सदैव सकारात्मक (+ve) विचार द्वारा सबल बनाना चाहिये।

मन में हमारे स्थूल शरीर (Physical body) के रोगों को निवारने की अद्भूत शक्ति है। महर्षि अरविंद ने लिखा है: ‘आपकी शक्तियों को संदेश दिजिये। आपके भीतर कार्य कर वे आपको निरोगी बनायेंगी ।’ हम सब का एक सर्व सामान्य अनुभव है कि जब घर में कोई बीमार होता है, तब रिश्तेदार-संबंधी- मित्र मिलने आते है। उन सभी की बातों में एक ही आश्वासन होता है - अच्छा हो जायेगा, चिंता न करें। यह बार-बार सुनने से बीमार के आंतरमन को तंदुरस्त होने क ी जोरदार सूचना मिलते ही रहती है, परिणाम स्वरूप वह तुरंत अच्छा हो जाता है। कभी इससे उल्टा भी हो जाता है। अगर कोई मित्र बीमार के मन में किसी बड़ी बीमारी का भय पैदा कर दे तो सामान्य बीमारी में से गंभीर बीमारी भी टपक पड़ती है। वास्तव में मन ही मनुष्य को जीलाता है। अमेरिका की एक मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर विद्यार्थीओं को विशूचिका के कल्चर(जंतु) ईकठ्ठे कर समझा रहे थे: ‘विद्यार्थी, इस कल्चर में इतने जंतु है कि हमारे डेम के पानी में डाल दिये जाए तो, जो दस लाख लोग यह पानी पीते है, विशूचिका में फँस कर उनकी मृत्यु हो जाए ।’ विद्यार्थी में से एक नटखट लड़के ने प्रोफेसर से कहा: ‘सर, आपने ही हमें मेडिकल सायकोलोजी में सिखाया है कि हमारा मन ही हमें जीलाता है, तो यह कल्चर आप पी जाए, आपका मन मज़बूत होगा तो आपको कुछ नहीं होगा ।’ एक क्षण रूक कर प्रोफेसर वह कल्चर पी गये। प्रोफेसर को कुछ नहीं हुआ। दूसरे दिन वर्त्तमान पत्र के खबरपत्री के प्रश्न के उत्तर में प्रोफेसर ने कहा: ‘मेरे लिये यह एक चुनौती थी। मैं निश्चित तौर पर मानता हुँ कि मन ही मारता है और मन ही जीलाता है, अतः मैने दृढ़ निर्धार किया कि यह ज़हर पीने के बावजूद मुझे कुछ नहीं होगा.... इसका परिणाम आपकी समक्ष है!’ आजकल रॅकी तथा प्राणिक हिलिंग जैसी जो परिचर्या पद्धति प्रचलित हुई है, उसकी जड़ में भी मन की अचिंत्य शक्ति ही काम करती है।

डॉ.ब्रुनर ने मन की शक्ति के बारे में गहन संशोधन किया है। उनका कहना है: हमारा अंतःकरण, विचार शक्ति का स्थूल स्वरूप है। यह न्यूट्रोन नामक परमाणु से बना है। उस पर ऋ ण(-ve)या धन(+ve)ऐसे कोई संकेत नहीं है। कोई विद्युत धारा भी नहीं है। तथापि उसकी शक्ति विद्युत से प्रबल है। यह न्यूट्रोन हर पल विशाल शक्ति के वातावरण को असर करता है। हमारा हरेक विचार या शब्द वातावरण में एक अमिट छाप छोड़ता है। उसकी गति प्रकाश की गति से भी अधिक है। एक पल मात्र में वह पृथ्वी की सात प्रदक्षिणा कर लेता है। डॉ. ब्रुनर कहते है, आप माने या न माने, परंतु मैं ने प्रयोग द्वारा यह साबित किया है कि शुद्ध मन द्वारा की गई निःस्वार्थ प्रार्थना पदार्थ के अणु-परमाणु की रचना में अचूक असर करती है। इसीलिये किसी संत या औलिया द्वारा आशीर्वाद के रूप में दिया गया प्रसाद या पानी में, वास्तव में शक्ति का आविर्भाव होता है और वह इच्छित परिणाम देता है। यह कोई वहम नहीं है बल्कि वैज्ञानिक सत्य है। किसी भी खाद्य पदार्थ या पानी पर प्रार्थना करने में आती है, तब प्रार्थना रूप से मन में से फेंकी गई शक्ति उस पदार्थ के अणु-परमाणु में संग्रहित हो जाती है और वह प्रसाद खाने वाले के आंतर मन को उत्तेजित कर इच्छित परिणाम पाती है। डॉ. बाराडक ने तो प्रार्थना द्वारा शक्ति पाते मन की गति को अति संवेदनशील फोटोग्राफिक प्लेट पर अदृश्य परंतु तेजस्वी तरंग को लेकर उसके फोटो लिये है। हमारे स्थूल शरीर के साथ एक भाव-शरीर भी हमारे आसपास आभा रूप से (Aura) संलग्न होता है। उस शरीर को हमारे विचार बहुत बड़ी असर करते है।

हमारी आसपास चेतना का सागर है। समस्त जगत इस चेतना से व्याप्त है। वैज्ञानिक इसे ईथर कहते है। हमारे विचारों की तरंग इस ईथर को आवरित कर उसका मूर्त स्वरूप रचता है। उसे संकल्प की मूर्ति यानि Thought forms कहते है। हरेक विचार हमारे शरीर में से उसके आनुसांगिक रंग की विविध तरंग उत्पन्न करता है। विचारों की तीव्रता पर उस स्वरूप की गति एवं आयुष्य अवलंबित होती है। उमदा विचारों के आकार अच्छे रंग के तथा अचूक स्वरूप के होते है। प्रबल भक्तिभाव आकाश में उपर जाते अवकाशयान जैसे स्वरूप का होता है, तो क्रोध का स्वरूप मैले सिंदुरिया रंग का और बीजली जैसे आकार का होता है, किसी के प्रति प्रेम हल्के गुलाबी रंग के पक्षी जैसा आकार धारण करता है, तो सभी के लिये निःस्वार्थ प्रेम हल्के गुलाबी रंग के सूर्य जैसा आकार धारण करता है। विचार क ी तरंग विचार के विषय को नहीं, अपितु उसके स्वरूप को ही बाहर भेजती है। एक हिन्दु प्रभु भक्ति करता हो तो उसके विचारों की तरंग के असर क्षेत्र में अगर कोई मुसलमान आए तो उसमें वे तरंगे अल्लाह के प्रति इबादत बढायेगी और कोई ईसाई आए तो उसमें ईसु की ओर अदम्य प्रेम भावना जगाएगी। इस प्रकार उच्च विचार करने वाले द्वारा अनजाने में भी उसके आसपास वाले असंख्य लोगों का हित होता है।

मन के इस गहन विज्ञान को को परा मनोविज्ञान (Para-psycology)कहते है। आखिरी 60साल में डॉ.रहाइन इस विषय पर अति गहन संशोधन किया है। थियोसोफी सोसायटी के आद्यस्थापक मॅडम ब्लेवेट्स्की, चार्लस लेडबीटर तथा श्रीमती एनी बेसंट ने इस क्षेत्र में अधिक श्रम किया है। रशिया में भी परामनोविज्ञान विषय में बहुत संशोधन हुआ है। मोस्को में मिबाइलोवा नामक एक स्त्री ने आंतरराष्ट्रीय परिषद में मन की शक्ति के बारे में कुछ हैरत अंगेज प्रयोग कर दिखाये तब उसकी एकाग्र वृत्ति के परिणाम स्वरूप टेबल पर रखी चीजें उड़ कर उसके हाथ में आ जाती थी, स्टील का चमच बिना छूए मूड़ जाता था, मोमबत्ती अपने आप जल जाती थी। युरी गेलर ने भी ऐसे प्रयोग सार्वजनिक तौर पर टी.वी.पर कर दिखाये। इसमें विस्मय की कोई बात नहीं है। यह सभी मन की अपार शक्ति का परिणाम है। मनुष्य का मन क्या कर सकता है इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण देखें। चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में एक बार कुमारगिरि नामक योगी आए। उन्होंने आकर यह ऐलान किया; ‘मैं सभी को भगवान के दर्शन करवा सकता हूँ ।’

राजा द्वारा अनुमति प्राप्त होने पर योगी ने संकल्प बल से सृष्टि बनाई उसमें भगवान के विराट स्वरूप के दर्शन करवाये। राज दरबार में दो व्यक्तिओं के सिवा सभी को दर्शन हुए। राजनर्तकी चित्रलेखा और महामंत्री कौटिल्य चाणक्य, इन दो महानुभवों को दर्शन का अनुभव नहीं हुआ। राजा द्वारा योगी के पास स्पष्टता माँगने पर योगी ने स्वीकार किया कि यह मेरे संकल्प बल द्वारा सर्जित माया थी। जो दृढ़ मनोबल वाले हो उनके मन पर अन्य के संकल्प का कोई प्रभाव नहीं होता है, फलस्वरूप प्रतिभा संपन्न चित्रलेखा एवं चाणक्य के मन पर योगी के संकल्प का प्रभाव न होने से उनको दर्शन नहीं हुए।