१३. मुकाम तेरहवाँ : मन एवं मस्तिष्क
एक बार कारण सत्संग की सभा में कुछ मित्र आध्यात्मिक चर्चा कर रहे थे। उस समय एक मित्र ने सवाल किया: ‘अगर शरीर की उत्पत्ति का मूल मन है तो एक प्रश्न होता है कि गर्भावस्था में जिस क्रम में गर्भ का विकास होता है उसके अनुसार यह ज्ञात होता है कि दिमाग का विकास तो सातवें-आठवें महिने में होता है, अर्थात् अंतिम क्रम में होता है। ऐसा क्यों?’ यह प्रश्न कई लोगों को होता है, क्योंकि इस प्रश्न के मूल में यह मान्यता है कि मन ही दिमाग है! हकीकत में मन (Mind) और (Brain) दिमाग दोनों अलग है। स्थूल व्यवहार के लिये दिमाग मन का उपकरण है -साधन है, इससे अधिक कुछ नहीं। शरीर की मृत्यु होते ही दिमाग का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, परंतु मन तो सक्रिय रहता है।
मन की तुलना में दिमाग बहुत ही धीमा साधन है। मन स्थूल भूमिका पर आकृतियाँ भेजता है उन आकृतियों के अनुसार काम करने की दिमाग को सूचना देता है। मन चित्र या छाया उभारता है और दिमाग उसके अनुसार कार्य करता है। ये छायाएँ (Images) मन के स्मृति भंडार में से आई रहती है। मन के स्मृति भंडार में अनंत जन्मों के संस्कार संग्रहित होते है। जबकि स्थूल दिमाग के केन्द्र में भी इस जन्म की स्मृति रक्षित रहती है। ऐसा कहा जाता है कि मृत्यु के समय दिमाग में संग्रहित सारे जीवन की स्मृति के आधार पर मरने वाली व्यक्ति अपने बीते हुए जीवन की सारी घटनाएँ एक फिल्म की तरह तादृश्य देखती है। इस फिल्म का उपादान दिमाग है। एक पल में दिमाग जीवन में जो कुछ हुआ है वह सभी कुछ मरने वाले की समक्ष प्रकट कर देता है। पश्चात दिमाग का तो नाश हो जाता है, परंतु मृत्यु से पूर्व वह स्मृति अंतरमन के आकाश में अंकित हो जाती है। जीव जब तक स्थूल देह में रहता है मन की, तब तक मन की स्मृति धूमिल रहती है। क्योंकि उस समय इन्द्रियाँ अवितर रूप से क्रियाशील होने से सारा समय दिमाग पर स्वयं की प्रतिक्रिया द्वारा प्रतिकृतियाँ उभारती ही रहती है। मृत्यु के बाद दिमाग का नाश होने से मन अति सक्रिय हो जाने से उसके भीतर छिपी अनंत जन्मों की स्मृतियों को ताजा कर देती है।
आधुनिक मेडिकल जानकारी के अनुसार मानवी दिमाग की उपरी सतह में दस लाख विविध ज्ञानतंतुओं के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान के आधार पर मानवी अद्भूत कार्य कर सकता है। इस कार्य में नाक पर बैठी मक्खी उड़ाने की सामान्य बात से लेकर सुपर कम्प्युटर बनाने की जटिल क्रिया तक समाविष्ट होती है। हमारा दिमाग भी एक अद्भूत कम्प्युटर से कुछ कम नहीं है। प्रकृति द्वारा बनाये गये इस बेमिसाल यंत्र की जगत में कोई तुलना नहीं है। इस यंत्र की आंतरिक जाल की अटपटी बुनाई में बीस लाख साल पुरानी जैविक उत्क्रांति की सुक्ष्मता युक्त जानकारी संग्रहित है। इतना ही नहीं, उसमें 50000 वर्ष पुरानी संस्कृति के उत्थान के बीज भी सँभाले हुए है। प्रत्येक मनुष्य के दिमाग में जीवन के दौरान होने वाली व्यक्तिगत उत्क्रांति का नक्शा तैयार रहता है।
दिमाग अर्धघन (Semi-solid) नरम पदार्थ का बना हुआ एक अंग है। जिसका वजन करीब 1300 ग्राम है। दिमाग की गहनता में हिप्पोकेम्पस नामक दूज के चाँद के सदृश एक क्षेत्र छिपा हुआ है। यहाँ कुछ विशिष्ट चेताकोष (Neurons) ईकठ्ठे हुए है। इन कोषों द्वारा स्मृति संकलन जैसी प्रक्रिया होती है। बादाम जैसे आकार के एमिगडाला के भीतर विशिष्ट चेताकोष का एक जत्था है जो भय के भाव को संचित करता है। दिमाग का बेइझल गेंगलिया नामक मटमैले रंग का पदार्थ हमारी विविध आदत एवं शारीरिक खूबियों को याद रखने में सहायक होता है। हमारे दैनिक जीवन की अलग-अलग परिस्थिति में विविध भाव प्रदर्शित करते है, कभी संयोगोनुसार क्षणमात्र में अनेक बातों का पृथक्करण कर देते है। ये सारे चमत्कार कुदरत के अजीब करिश्मा जैसा यह दिमाग करता है। मनुष्य द्वारा बनाई गई न्युरल सिलिकोन चिप्स कभी भी ऐसे करिश्मे कर सकेगी?
आधुनिक वैज्ञानिको ने यह खोजा है कि मनुष्य का आइ-क्यु अर्थात् बुद्धिअंक जितना ऊँचा, उसके दिमाग में उतनी कम प्रवृत्ति होती है। मस्तिष्क विज्ञान में Intelligence (मेघा) को न्युरल एफिश्यन्सी (ज्ञानतंतुओं की उच्च क्षमता) गिनी जाती है। स्मार्ट दिमाग बेकार की मज़दूरी नहीं करता है। वह कम शक्ति का उपयोग कर अधिक अच्छा कार्य करता है। इस प्रकार देखें तो बुद्धि ज़हेमत से अधिक कौशल्य का परिणाम है। अब तो M.R.I. और P.T.I स्केन की मदद से वैज्ञानिक मोनिटर स्क्रिन पर दिमाग की क्रियाओं को देख सकते है। डेल गाडो नामक एक वैज्ञानिक ने एक अनोखा प्रयोग किया। उसने एक जबरदस्त खूँखार स्पेनिश बैल के दिमाग में इलॅक्ट्रोड्झ लगा कर मैदान में भेजा। यह बैल आक्रमक था। मैदान में खड़े लोगों को मारने उनकी ओर बढ़ रहा था, परंतु वैज्ञानिको ने वीज संवेदनो के द्वारा उसके दिमाग में स्थित आक्रमक केन्द्र को बंद कर देने से वह अचानक रुक गया और भीगी बिल्ली की तरह खड़ा रहा। उसके एमिगडाला क्षेत्र में रेडियो तरंग पहुँचते ही वह शांत हो गया था। आधुनिक विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि खूँखार आतंकवादी को अब जेल की सलाखों के पीछे बंद रखने की आवश्यकता नहीं है। उनको पेरोल पर छोड़ते समय उनके दिमाग के साथ रेडियो ट्रान्समीटर्स जोड़ दिये जाये जो उनके दिमाग की सभी क्रियाओं का जीवंत प्रसारण करती रहे, पुलीस कंट्रोलरुम से उसकी विशिष्ट मानसिक परिस्थिति का अवलोकन करती रहे। जैसे ही उसके दिमाग में असामाजिक विचार की आहट हो तुरंत ही दूर संवेदको की मदद से उनको दबा दिया जाए। इस प्रकार गुन्हा तो कम होंगे, परंतु क्या यह नहीं लगता कि वैज्ञानिक इस प्रकार दिमाग के साथ वर्तन कर उसकी रहस्यमयता और सर्वोपरिता को ललकार रहे है?
इस दुनिया में सबसे मूर्ख मनुष्य इतने अधिक प्रश्न पूछता है कि सबसे सयाना व्यक्ति भी उसके सवालों का जवाब नहीं दे सकता है। स्वाभाविक है कि हमारा दिमाग और मन इतना कुशल नहीं है कि वह स्वयं की सक्षमता को पूर्णतः समझा सके!