६. मुकाम छठ्ठा : मन का स्वभाव

हम सब का सामान्य अनुभव है कि हमारा मन सदैव एक ही परिस्थिति में नहीं रहता है। कई बार बहुत अच्छे विचार आते है तो कभी खराब! कई बार मन बहुत सक्रिय हो जाता है, तो कई बार बिल्कुल निष्क्रिय! इसका कारण है मन का त्रिगुणात्मक स्वभाव। हमारा मन मूलभूत गुणों का संमिश्रण है - सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण।

सत्त्वगुण पवित्रता, ज्ञान और आनंद को उत्पन्न करने वाले समतुला का तत्त्व है। रजोगुण प्रवृत्ति, इच्छा और चंचलता उत्पन्न करने वाली गति शीलता का तत्त्व है। तमोगुण प्रमाद, अवसाद और भ्रम उत्पन्न करने वाला जड़ता का गुण है। तमोगुण मन को नीचे की सतह पर ले जाता है, इस अवस्था में मन में कोई विचार नहीं आता है। रजोगुण मन को तितर-बितर कर अस्थिर बनाता है तथा सत्त्वगुण मन को उच्चत्तर दिशा में ले जाता है। सत्त्वगुण की अवस्था में मन शांत एवं स्वस्थ होता है। इस अवस्था में चित्तरूप सरोवर की तरंगे थम गई होती है एवं उसका जल भी स्वच्छ हो गया होता है। यह स्थिति चित्त की निष्क्रियता की स्थिति नहीं है, अपितु अत्यंत सक्रियता की स्थिति है। शांत रहना शक्ति का सबसे बड़ा प्रदर्शन है। चंचल होना अत्यंत सरल है। घोड़े की लगाम को छोड़ दिया जाये तो घोड़ा आपको लेकर जहाँ चाहे दौड़ जायेगा। यह तो कोई भी कर सकता है, परंतु जो व्यक्ति दौड़ते घोड़े की लगाम पकड़ कर उसको बस में कर रोक सकता है, वही ताकतवाला है। शांत चित्त वाला इन्सान वही कहा जाता है, जिसका मन की तरंग पर बस हो। क्रियाशीलता में ओछी कक्षा के बल का प्रदर्शन है और स्वस्थता में उच्च कोटि के बल का प्रदर्शन है व्यक्तिगत मन की रचना इन तीन गुणों की मात्रा के विविध संयोग और विनियोग द्वारा नियत होती है। मानव स्वभाव के वैविद्य और उसके मन की चंचलता का भी यही कारण है।

भगवान श्री स्वामिनारायण ( ग.म.23 में )वचनामृत में मन के स्वभाव के बारे में स्वयं की विशिष्ट शैली में कहते है, ‘.......जिसका मन बुरे विषय में तप्त नहीं होता एवं भले विषय में तुष्ट नहीं होता,ऐसा जिसका मन रहता हो उसे परम भागवत संत जानें; ऐसा मन होना सरल बात नहीं है...... मन का ऐसा स्वभाव है, जिस प्रकार बालक को सर्प, अग्नि तथा खुली तलवार को पकड़ने न दें तथापि दुःखी होता है, उसी प्रकार मनको विषय भोगने न दें तो दुःखी होता है और अगर भोगने दे तो विमुख होकर अतिशय दुःखी होता है। अतः जिसका मन भगवान में आसक्त हुआ हो और विषय के योग से तुष्ट-तप्त नहीं होता है उसे ही साधु समझें ।’

स्वामी विवेकानंद ‘राजयोग’ में कहते है: ‘इन्सान धार्मिक बनता है इसका प्रथम चिन्ह यह है कि वह आनंदित होता है...... सत्त्वगुण का स्वभाव है आनंदी होना। सात्त्विक मनुष्य को सब कुछ आनंदी लगता है, जब आनंदी भाव आ जाए तो यह समझे कि योग साधना में आगे बढ़ रहे है ।’

मन चेतना की भिन्न-भिन्न भूमिकाओं पर क्रियाशील बनता है। चेतन भूमिका पर मन की सभी क्रिया सामान्य रूप से अहंकार युक्त होती है। अचेतन भूमिका पर सामान्यतः अहंकार का भाव नहीं रहता है। इन दोनों से उपर मन एक अधिक ऊँची भूमिका पर कार्य कर सकता है। उस भूमिका में मन सापेक्ष चेतना से भी उपर जा सकता है। जिस प्रकार अचेतन भूमिका चेतन भूमिका से नीचे है, उसी प्रकार इस सापेक्ष चेतन से उपर भी एक भूमिका है, जिसे ‘अतिचेतन’ भूमिका कहते है। यहाँ भी अहंकार नहीं होता है। परंतु अचेतन एवं अतिचेतन के बीच अधिक अंतर है।सुषुप्ति अवस्था में मन अचेतन भूमिका से परे होता है। उभय भूमिकाओं पर मन शांत है। अहंकार भावना से मुक्त है, परंतु सुषुप्ति में अज्ञान है, अधंकार है, तमस है। जब कि समाधि ज्ञानमय है, तेजोमय है, सात्त्विक है! अतिचेतन अवस्था में मन उसकी शुद्धत्तम अवस्था में होता है।