१७. मुकाम सत्रहवाँ : ध्यान
‘ध्यान’ शब्द का सामान्य अर्थ होता है चिंतन करना, मनन करना या निहारना। ध्यान कोई ऐसी क्रिया नहीं है जिसे जीवन का थोड़ा समय देकर पूर्ण कर दिया जाये। जागरुकता के साथ जागृत जीवन जीना ही ध्यान है। स्वामी विवेकानंद ध्यान की सर्वमान्य व्याख्या देते हुए ‘राजयोग’ में लिखते है: ‘मन जब किसी आंतरिक या बाह्य स्थान पर चिपकने का अभ्यासु हो जाता है, तब उसमें मानो उस स्थान की ओर एक अखंड प्रवाह रूप से बहने की शक्ति आती है। इस स्थिति को ध्यान कहते है। यह ध्यान अवस्था हमारे अस्तित्व की सर्वोच्च स्थिति है ।’
पतंजलि के योगसूत्रों के अनुसार अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा के बाद सातवीं भूमिका पर ध्यान आता है। इसका अर्थ यह है कि उपर्युक्त छः भूमिका में मन जब तालीमी हो जाता है तब सहज भाव से सातवीं ध्यान अवस्था में स्थित होता है। ध्यान निंद्रा जितना ही सरल एवं सहज है। दोनों में फर्क केवल इतना ही है कि मन निंद्रा में से कुछ भी पाये बिना ही जागृत अवस्था में आता है। जब कि ध्यान में से कुछ अनुभूति पाकर आता है। मन के पार जाने की पूर्व भूमिका रूप कुछ प्रक्रिया आवश्यक है। जब तक विचार हैं, संकल्प विकल्प है, देहभाव है तब तक ध्यान सुलभ नहीं है। इसके बारे में भगवान श्री स्वामिनारायण वचनामृत में कहते है: ‘जब अंतःकरण की समक्ष दृृष्टा, जो जीवात्मा,देखता रहे और बाहर जो स्थूल शरीर एवं उससे संबंधित जो विषय उन सब को भूल जाता है, अंतःकरण एवं दृष्टा इन दोनों के बीच जो विचार है, उस विचार के द्वारा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इन सभी के रूप जानें। पश्चात विचार की दृष्टि से उस अंतःकरण के संकल्प की समक्ष देखते हुए जब संकल्प बंद हो जाए तब भगवान की मूर्ति का ध्यान करें। जब तक विचार संकल्प का जोर हो तब तक संकल्प की ओर देखते रहे, परंतु ध्यान न करें ।’ (सा.12)
सामान्यतः हमारी चेतना विचारों के पोशाक पहन कर विहार करती है। प्रत्येक विचार चाहे वह सुख का हो या दुःख का, उसके साथ इतना तादात्म्य करता है कि विचार के गुण के अनुसार तत्काल सुख या दुःख का अनुभव करता है। इस सुख दुःख से परे होने के लिये हमारी चेतना को विचारों की जंजाल से मुक्त करवानी है।इसका एक ही सरल राजमार्ग है, विचारों को तटस्थ भाव से निहारना। विचारों को जागरूकता पूर्वक देखने से हमारी एषणाएँ - तृष्णाएँ -इच्छा पहचानी जाती है। जब हम जागृत होकर विचारों को -वृत्तियों को निहारते है, तब किसी वृत्ति की ताकत नहीं कि वह हमें उसके साथ खिंच ले जाये। हमारी जागरुकता ही दीपमीनार बनकर विचारों के महासागर में से हमारी चेतना को बाहर निकाल कर मनसे पार की प्रशांत अ-मन अवस्था में ले जाती है और वहीं से आरंभ होती है, हमारी ध्यान साधना।
भगवान श्री स्वामिनारायण ने वचनामृत में हमारे मन की वृत्ति ध्यान के द्वारा परमात्मा के स्वरूप में किस प्रकार स्थित होती है, इसका अति सूक्ष्म तत्त्व ज्ञान सम्यक् रूप से समझाया है। भगवान श्री स्वामिनारायण के मतानुसार हमारे नेत्र की वृत्ति अरूप होते हुए भी स्थूल एवं पृथ्वी तत्त्व प्रधान है। परिेणाम स्वरूप वृत्ति जब परमेश्वर के स्वरूप में रखी जाती है प्रथम वह वृत्ति पतली डोर की सदृश पीली प्रतीत होती है। मकड़ी जिस प्रकार दो खंभो के बीच अपनी जाल बुनती है, उसी प्रकार वृत्ति अंतःकरण एवं भगवान के स्वरूप के बीच मकड़ी की तरह संलग्न होने से पृथ्वीतत्त्व युक्त वृत्ति परिवर्तित होकर जलतत्त्वमय श्वेत बनती है। ध्यान-साधनाआगे बढ़ने से, श्वेत वृत्ति अग्नितत्त्व रूप रक्त होती है, तत्पश्चात वृत्ति जब वायुतत्त्व प्रधान होती है, तब नीली प्रतीत होती है और अंततः आकाशतत्त्व प्रधान होती है तब श्याम प्रतीत होती है। पश्चात पंचतत्त्व की प्रधानता मिट कर वृत्ति निर्गुण होती है, तब अतिशय प्रकाशमान प्रतीत होती है और भगवान के स्वरूप के आकार से हो जाती है। (व.8)
इस प्रकार ध्यान द्वारा वृत्ति निर्गुण होने से जीवसत्ता से भगवान का स्वरूप दृष्टिकृत होता है। पश्चात मन का अस्तित्व ही नहीं रहता है। जिस प्रकार भ्रमर के ध्यान से कीटक भ्रमर बनता है, उसी प्रकार परमात्मा के ध्यान से आत्मा परमात्मा रूप होती है, परंतु वह स्वयं परमात्मा नहीं बन जाती है। इसके अनुसंधान में भगवान श्री स्वामिनारायण ने (अं.37 में ) वचमानृत में स्पष्ट रूप से कहा है: ‘भगवान जैसे तो एक भगवान ही है, अन्य कोई नहीं है एवं भगवान की साधर्म्यता को प्राप्त, भगवान के धाम में जो भगवान के भक्त है, उनका आकार भी भगवान जैसा ही है। तथापि वे पुरुष हैं एवं भगवान पुरुषोत्तम है, वे सर्व में श्रेष्ठ है और उनको उपास्य है तथा सर्व के स्वामी है, उस भगवान की महिमा को कोई ज्ञात नहीं कर सकता है। ऐसे दिव्य मूर्ति भगवान निर्गुण है, ध्येय है तथा उनका जो ध्यान करते है निर्गुण हो जाते है। ऐसा भगवान का स्वरूप है ।’
भगवान के किस स्वरूप का ध्यान करें। इसके बारे में स्पष्टता करते हुए भगवान श्री स्वामिनारायण स्वयं के सर्वोपरि उपास्य स्वरूप का ही ध्यान करने की नसीहत देते हुए बताया है: ‘पुरुषोत्तम नारायण किसी कारण से पुरुष रूप से होते है तब वह पुरुष.... पुरुषोत्तम के प्रकाश में लीन हो जाते है और पुरषोत्तम ही रहते है। माया रूप से होते है तब माया रूप से होते है तब माया भाव भी पुरुषोत्तम के तेज में लीन हो जाता है, उस रूप से भगवान ही रहते है.... इस प्रकार अनेक प्रकार के कार्य के लिये जिनमें पुरुषोत्तम का प्रवेश होता है उनमें स्वयं के प्रकाश में लीन कर स्वयं ही उस रूप के द्वारा सर्वोत्कर्ष रूप से बिराजमान होकर रहते है और जिसमें स्वयं बिराजमान होते है उसके प्रकाश को ढक कर स्वयं क ा प्रकाश प्रकट करते है, जिस प्रकार अग्नि लोहे में प्रविष्ठ होता है तब लोहे का शीतल गुण एवं श्याम वर्ण टालकर स्वयं के गुण को प्रकाशित करता है तथा जिस प्रकार सूर्य उदय होता है तब उसके प्रकाश में सभी तारे-चन्द्रमादि तेज में लीन हो जाते है और एक सूर्य का ही प्रकाश रहता है, उसी प्रकार भगवान जिसमें आते है तब उसके तेज का पराभव कर स्वयं के प्रकाश की अधिकता जताते है, जिस कार्य के लिये स्वयं जिसमें प्रविष्ठ होते है, उस कार्य के होने के पश्चात स्वयं अलग हो जाते है तब वह जैसा होता है वैसा रह जाता है। उसमें जो अधिक दैवत दृष्टिकृत होता था, वह पुरुषोत्तम भगवान का था ऐसा समझें। इस प्रकार सर्व के कारण, सदा दिव्य साकार ऐसे, प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम नारायण मिसरी के नरियल की सदृश त्याग भाग न समझें, जैसी मूर्ति देखी हो उसका ही ध्यान-उपासना- भक्ति करें ।’ (पं.7) श्री हरि की इस वाणी में स्वामिनारायण संप्रदाय का एकेश्वरवाद स्पष्ट रूप से प्रतिघोषित होता है। अनंत कोटि ब्रह्मांड में भगवान तो एक ही है, वे स्वयं के मूल स्वरूप में भगवान श्री स्वामिनारायण नाम से पृथ्वी पर प्रकट हुए। अनंत काल से जगत में जो भी विशिष्ट इश्वरीय कार्य हुए वे सभी उस भगवान द्वारा ही हुए -उनके उस माध्यम में प्रवेश द्वारा ही हुए है। अतएव ध्यान तो परात्पर परब्रह्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री स्वामिनारायण का ही करें। एक बार एक हरिभक्त ने परम पूज्य गुरुवर्य श्री नारायणभाई से पूछा: ‘गुरुजी, अक्षरधाम में भगवान श्री स्वामिनारायण की दिव्य तेजोमय व्यतिरेक मूर्ति कैसी है? गुरुवर्य ने मंद हँसते हुए कहा था: ‘अक्षरधाम की वह दिव्य मूर्ति अति.... अति मनोहर है। उसके जैसी सुंदरता मैंने पृथ्वी पर तो क्या अखिल ब्रह्मांड में भी कहीं नहीं देखी। यहाँ मंदिर में जो घनस्याम महाराज़ की मूर्ति है उसमें और अक्षर धाम की मूर्ति दोनों में महिमा की दृष्टि से अणुमात्र का फर्क नहीं है, परंतु स्वरूप सौंदर्य एवं दर्शन-माधुर्य में दोनों के बीच अतिशय भेद है। उस मूर्ति का तेज अलौकिक है, न ही सूर्य किरण सदृश है, न ही चांदनी सदृश। पृथ्वी पर एक भी रंग ऐसा नहीं है जिसके साथ उस तेज की तुलना की जाए। उस मूर्ति ने न ही वस्त्र सजें है, न ही आभूषण धारण किये है, तथापि अति रमणीय लगती है। इस लोक में कोई स्वरूप या कोई दृश्य उस मनमोहक मूर्ति जितना रम्य कभी भी प्रतीत नहीं होता है। उस मूर्ति को मैं अभी भी देख सकता हुँ, परंतु उसका सौंदर्य थोड़ा भी शब्दों में कहना संभव नहीं है ।’
पश्चात हरिभक्त ने पूछा: ‘यह कहा जाता है कि अक्षरधाम में श्रीजीमहाराज़ की मूर्ति में असंख्य अनादिमुक्त रसलीन होकर रहते है, भक्ति की पराकाष्ठा जैसी प्रगाढ तादात्म्य की अवस्था में मुक्त का अलग अस्तित्व रहता है?’ गुरुदेव अति प्रसन्नता पूर्वक बोले: ‘आपने अतिशय मार्मिक प्रश्न पूछा है। Anadi Muktas have identified themselves with His divine form of the God almighty, that is why they are absolutely absorbed in the divine form of God enjoying His supreme bliss all the time. अनादिमुक्त मूर्ति रूप होकर मूर्ति में रहकर मूर्ति का सुख लेते है, भगवान सुखदाता है और मुक्त सुखभोक्ता है- यही भेद है!’
ध्यान के अनंत प्रकार है, परंतु जिस ध्यान द्वारा आत्मा का आत्यंतिक कल्याण हो वही ध्यान मुमुक्षु को करना चाहिये। इसके बारे में मूर्ति के वास्तविक मर्मी अबजीबापाश्री कहते है: ‘देहात्म बुद्धि सहित भगवान श्री स्वामिनारायण मूर्ति की सन्मुख धारणा कर सामान्यतः सभी जो ध्यान करते है, उसे अवरभाव (इस लोक) का ध्यान कहते है। जब सदा दिव्याकार मूर्तिमान सर्वोपरि भगवान श्री स्वामिनारायण की मूर्ति के तेज के साथ निज आत्मा को एकाकार कर उसमें मूर्ति की धारणा करें उसे परभाव (परमात्मा संबंधी दिव्य भाव) का ध्यान कहते है। यह ध्यान सिध्ध् होने से मुमुक्षु परम एकांतिक मुक्त की स्थिति को प्राप्त करता है। श्रीजीमहाराज़ की मूर्ति में रह कर मूर्ति के तदाकार भाव को प्राप्त कर प्रतिलोम रूप से मूर्ति का अखंड ध्यान करना यह परभाव (परमात्मा संबंधी दिव्य भाव) का उत्तमोत्तम ध्यान है ।’
मुमुक्षु जब इस प्रकार के ध्यान में संलग्न होता है तब अनेक विघ्न आते है, अतः जब ध्यान करें महान मुक्त अनादि मुक्त को साथ रखें और उनकी सहायता मांगे। ध्यान में सदैव श्रीजीमाराज़ के साथ अनादिमुक्त की धारणा करने से स्नेह अधिक होता है एवं संतपुरुष कृपा कर साधन की समाप्ति कर चैतन्य को मूर्ति रूप कर देते है। अनादि मुक्त की स्थिति दास भाव की चरम सीमा है, मुक्त भाव की पराकाष्ठा एवं प्रेमलक्षणा भक्ति की सर्वोत्कृष्ट स्थिति है!