५. मुकाम पाँचवां : मन के प्रकार

वैसे तो मन एक ही है, परंतु उसका अनुभव दो प्रकार से होता है। एक जागृत मन, जिसे बाह्य या बहिर्मुख मन भी कहा जाता है और दूसरा अजागृत मन जिसे आंतर मन या अज्ञात मन कहा जाता है।

हमारी चेतना का बहुत कम भाग जिसमें प्रकट होता है, उसे हम जागृत मन कहते है। वह अनेक प्रकार की इच्छाओं से भरा है। इन इच्छाओं में जब विरोधाभास होता है तब हमारा मन विक्षुब्ध होता है परिणाम स्वरूप हमारे शरीर में थकान महसूस होती है। ध्यान के द्वारा प्रथम एकाग्रता और बादमें निराग्रता आती है। एकाग्रता में विचारों के विरोध का शमन होने से, शक्ति के अधिक व्यय की बचत होती है। इस प्रकार एकाग्रता शक्ति की अधिक बचत करती है। जबकि निराग्रता में शक्ति का करीब संचय होता है। जबकि समाधि में शक्ति का पूर्ण संचय होता है।

हमारे स्थूल शरीर के अणु-अणु में व्याप्त मन, आंतर मन ही है। जो सदैव कार्यशील रहकर शरीर की नवरचना और संरक्षण करता है। पत्थर, वनस्पति, कीट,पक्षी एवं मनुष्य में आंतर मन समान रूप से व्याप्त एवं क्रियाशील है। पशु पक्षी तथा वनस्पति में जागृत मन सुषुप्त है। अतः आंतर मन को खुला मैदान मिला है, इसी कारण से पत्थर की आयुष्य और स्थिति लंबे काल तक एक जैसी ही टिकी रहती है। वनस्पति में भी जागृत मन बहुत कम मात्रा में होने से उसकी नवरचना एवं संरक्षण की कार्यवाही अत्यंत प्रबल है, परिणाम स्वरूप बरगद, पीपल आदि वृक्ष सदियों तक टिके रहते है और जीते है। पशु-पक्षी तथा जीव-जंतु में मनुष्य की तुलना में राग भी कम होते है। इसका कारण उनके जागृत मन से आंतर मन बलवान होने से शरीर की नवरचना एवं संरक्षण स्वाभाविक तरीके से होता है।

ख्यातनाम मनोवैज्ञानिक डॉ. सिग्मंड फ्रोइड कहते है: ‘हमारे दैनिक जीवन में होने वाली कई घटनायें हम भूल जाते है ऐसाउपरी तौर पर लगता है, परंतु हकीकत में कुछ भुलते नहीं है। सब कुछ हमारे अजागृत मन में (Unconciouc mind) में संग्रहित होता है। ये दबी हुई स्मृति ही हमें दर्शित करती है। उसे ही हम अंतःप्रेरणा यानि Intuition कहते है। जब हम अंतःप्रेरणा या स्फूरणा के विरुद्ध कोई कार्य करते है, तब मन में विकृति पैदा होती है। यह विकृति कभी क्रोध द्वारा या निंदा द्वारा प्रकट होती है, परंतु ऐसा बार-बार हो और विकृति बाहर न आ सके तो, वह अजागृत मन को क्षति पहुँचाती है। परिणाम स्वरूप अज्ञात मन में एक प्रकार का असंतुलन पैदा होता है, जो समयांतर में रोग का स्वरूप धारण करता है ।’

डॉ.सिग्मंड फ्रोइड आंतर मन के तीन भाग करते है: ईड,अहम् और विशेष अहम्। ईड में हमारे पूर्वजो की आदिम प्रकार की प्रवृत्तियाँ भरी रहती है। आदिमानव जिस प्रकार से जीते उनके आहार, निंद्रा, भय, और मैथून के आसपास ही सर्व वृत्ति- प्रवृत्ति रहती थी, यह सभी कुछ ईड में संग्रहित रहता है। अहम् की वृत्ति पर हमारा समस्त अभिगम रहता है। जब कि अहम् की तालिम हमारे संस्कार और मान्यताओं से मजबूत होती है। मान्यताओं के कारण इस विश्व में देश-देश के बीच, कौम-कौम के बीच, धर्म-धर्म के बीच, राज्य-राज्य के बीच, ज्ञाति-ज्ञाति के बीच और मनुष्य-मनुष्य के बीच सदियों से झगड़े एवं युद्ध चल रहे है। मानव सब कुछ छोड़ने को तैयार हो सकता है, परंतु मान्यता छोड़ने को तैयार नहीं हो सकता है।

जागृत अवस्था में ये वृत्तियाँ संस्कार के बँधनों के कारण अव्यक्त रहती है। परंतु नींद में वे स्वप्न द्वारा व्यक्त होने की कोशिश करती है। सभी वृत्तियाँ एक साथ व्यक्त होने की कोशिश करती होने के कारण विकृत रूप से प्रकट होती है। ईड, अहम् और विशेष अहम् साथ में ही व्यक्त होने के कारण स्वप्न का कोई मेल नहीं होता है। सारी रात देखे हुए स्वप्न को अगर लिखने जाए तो पाँच-छः वाक्यों में हम लिख सकते है, क्योंकि अधिकतर स्वप्न निरर्थक और उलझन भरे होते है।

हमारे शरीर में होते छोटे-बड़े रोग बिना कारण यूँ ही नहीं हो जाते है। आंतर मन के कार्य में बार-बार विक्षेप होने से ही व्याधि होती है। बंगाल में श्री श्रीठाकुर अनुकूलचंद्र नामक एक गृहस्थ संत हो गये। एक बार सुबह के समय उनके पास दुर्गानाथ नामक उनका भक्त आकर कहने लगा, ‘ठाकुर, कई महिनों से मुझे भयंकर पेचिश हुआ है, कई दवाईयाँ लेने के बाद भी ठीक नहीं हो रहा है। आप कुछ कृपा करें....’ श्री ठाकुर बोले, ‘ओहो..... यह बात है? भगवान की कृपा से अब बिना दवाई के ही ठीक हो जायेगा। दोपहर का भोजन आप यहीं करके जाइयेगा ।’ श्री ठाकुर ने दुर्गानाथ के लिये नये चावल तथा मोटे वाल की दाल बनवाये। भोजन के समय भोजन देखकर दुर्गानाथ सोच में पड़ गये। श्रीठाकुर उनका मनोभाव जान गये। उन्होंनेकहा, ‘दादा, डरिये नहीं भोजन कीजिये और संतुष्ट होकर खाईये ।’ कई महिनों के बाद मनभावन भोजन मिलने के कारण दुर्गानाथ भोजन पर टूट पड़े। पूर्ण संतुष्ट होकर खाया, तब ठाकुर ने उनसे कहा, ‘जाओ जाकर सो कर आराम करो ।’ लंबी वामकुक्षी के पश्चात जब दुर्गानाथ उठे तब बिलकुल स्वस्थ थे। पेचिश की बीमारी के कोई लक्षणप्रतीत न होने से उन्होंने श्रीठाकुर से पूछा: ‘ठाकुर बिलकुल विरूद्ध धर्मी खुराक खाने के बावजुद यह रोग किस प्रकार ठीक हुआ? इसमें तो कार्य कारण का कोई संबंध नहीं दिखता है!

श्रीठाकुर ने उन्हें समजाते हुए कहा: ‘आपके अज्ञात मन को पढ़ने से मुझे लगा बहुत समय पहले आपको मोटे चावल और मोटे वाल की दाल खाने की तीव्र ईच्छा हुई थी, परंतु संयोगानुसार वह पूरी न हो सकी थी। उस प्रबल ईच्छा का आंतर मन में दमन होने से आँत के स्नायुओं में विकृति पैदा हुई। उसमें से यह दर्द शुरु हुआ। यह खुराक पहली नजर में विरुद्ध धर्मी लगते हुए भी, इससे ईच्छा का शमन होने से दर्द ठीक हो गया ।’

इस प्रकार हमारे स्वास्थ्य पर हमारे मानस का प्रबल प्रभाव है। फलस्वरूप मनोवैज्ञानिक औषध की जगह दर्दी को सहानुभुति, उष्मा एवं आत्मियता देकर उनके आंतर मन में दबी वृत्तियों को बाहर लाकर उनके रोग दूर करते है। इसके लिये डॉ. फ्रोइड ने रेचन पद्धति बताई है। जो भी तकलीफ, तनाव या संघर्ष हो उसे बाहर लाईये। एकांत स्थल पर खुशनुमा वातावरण में बैठकर एक कागज़ पर आपके मन के विचार और नापसंद बातों की फरियाद लिखीये। उसे बार-बार पढिये इसमें अन्य फरियाद बढाइये, मन की हरेक फरियाद को याद कर लिखीये, अंततः उसे फाड़ दिजिये। इसप्रकार बार-बार करने से मन हल्का होते जाएगा। डॉ. फ्रोइड की इस रेचन पद्धति के विकल्प के रूप में प्रार्थना एवं नामस्मरण उत्तम उपाय है। प्रार्थना के दरमियान मन में से नकारात्मक भावों का उन्मुलन होता है तथा नामस्मरण के द्वारा मन निर्मल होता है।

अखंड अजपाजप द्वारा हरिस्मरण करने से परमात्मा के प्रति निष्ठा रूप वृत्ति बाह्य मन तथा आंतर मन में लीन होने लगती है। परिणाम स्वरूप पूर्व की रागादि वृत्तियाँ दब जाती है और क्रमशः क्षीण होने लगती है। इसमें श्रद्धा महत्वपूर्ण कार्य करती है। श्रद्धापूर्वक धीरज से दीर्घ काल पर्यंत स्मरण करते रहने से मन उसके सहज स्वरूप में आकर पूर्व की सर्व रागादि वृत्ति तथा वासना को फेंक देता है। जो उद्देश्य सुमिरन से सिध्ध् होता है, वह ध्यान से भी सिध्ध् हो सकता है। ध्यान में मन विचारशून्य (Thoughtless) होता है और विचारशून्य मन क्रमशः आंतरिक भँवर एवं वृत्तियों को झाड़-पोंछ कर साफ कर देता है। मन निर्मल होते ही शांत हो जाता है। मन शांत होने पर ही हम देख सकते है कि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है?