१५. मुकाम पंद्रहवाँ : चिंता छोड़ो स्वस्थ रहो

हमने कभी यह सोचा है कि हमें छींके क्यों आती है? अचानक हिचकी क्यों आती है?कभी-कभी सुबह-सुबह में जम्हाई क्यों लेते है? अगर गहराई से सोचा जाए तो कोई अनचाही भावना या चिंता ऐसी चेष्टाओं के मूल में हलचल मचाती है। ऐसी चेष्टाएँ दिखती शारीरिक है, परंतु होती है मनोवैज्ञानिक! हमारा शरीर हमारे मन के प्रति इतना संवेदनशील है कि हमारे प्रत्येक विचार, भावना, चिंता और तनाव की सीधी असर शरीर पर होती है।

केनेड़ा के नॉबल पारितेषिक विजेता डॉ. हन्स सेल्ये ने मानसिक तनाव की शरीर के भिन्न- भिन्न अंगो पर क्या असर होती है इसका तलस्पर्शी संशोधन किया है। हमारे दिमाग के चेतातंत्र में अनुकंपी (Sympathetic) एवं परानुकंपी (Parasympathetic) ये दो प्रकार के ज्ञानतंतु है जो मानसिक तनाव की स्थिति में महत्वपूर्ण हिस्सा लेते है। सामान्यतः परानुकंपी ज्ञानतंतु हमारे शरीर के आंतरिक अवयव के कार्य का नियंत्रण करते है, परंतु जब टेन्शन होता है तब अनुकंपी ज्ञानतंतु सक्रिय होकर एड्रेनालिन नामक रासायनिक द्रव्य छोड़ते है। एड्रेनालिन भय एवं संकट के समक्ष शरीर को टिकने की क्षमता देते है। इसी घटना को विस्तार पूर्वक समझें।

जब हमारे जीवन में शारीरिक या मानसिक स्तर पर कोई संकट आता है, तब हमारे मन में भय एवं चिंता की भावना पैदा होती है। हाँलाकि हर व्यक्ति में संकट का सामना करने की क्षमता अलग-अलग होती है। अत्यंत भावनाशील तथा नरम दिल के लोग छोटी सी तकलीफ में भी भयभीत हो जाते है, जब कि कुछ मोटी चमड़ी के ढीट लोग आसमान गिरने जैसे संयोग में भी दृढ़ता से खड़े रहते है। इस बारे में जीवन के प्रति आपका दृष्टि बिंदु और अभिगम ही अभिनित होता है। तकलीफ छोटी हो या बड़ी, परंतु वह जब आपके मन को विचलित करे तब उसके प्रत्याघात हमारे शरीर पर कैसे और किस प्रकार होते है, उसे अब शरीर विज्ञान की भाषा में देखें।

चिंता एवं उद्विग्नता के कारण दिमाग का सेरेब्रल कोर्टेक्ष नामक भाग विशिष्ट प्रकार की उत्तेजना का अनुभव कर अन्य महत्वपूर्ण हिस्से हाईपोथेलेमस को यह संदेशभेजता है। हाईपोथेलेमस इस SOSको पिच्युटरी ग्रंथि को भेजता है। परिणाम स्वरूप ACTH (Adrenocortycotrophic hormone) नामक होर्मोन का स्त्राव होता है। पिच्युटरी की तरह दूसरी महत्वपूर्ण ग्रंथि है एड्रेनल। पेट के खोखले हिस्से में दोनों मूत्रपिंड के उपर एक-एक एड्रेनल ग्रंथि है। पिच्युटरी का ACTH एड्रेनल्स के कार्टेक्ष पर असर करने से उनमें से मेडुला एड्रेनालिन और नोरएड्रेनालिन नामक होर्मोन्स रक्त प्रवाह में छूटते है। इन होर्मोन्स के कारण शक्ति की खान सदृश लीवर में से ग्लुकोझ मुक्त होता है। उससे रक्तवाहिनी फैलती है और रक्तचाप बढ़ता है। परिणाम स्वरूप स्नायु तथा आंतरिक अवयव को रक्त का पर्याप्त जत्था त्वरित गति से प्राप्त होता है। इन संयोग में रक्त का जमने का गुण भी प्रबल बनता है। अतएव अकस्मात के समय में अगर शरीर को हानि हो तो दिमाग के उपर्युक्त प्रोग्रामिंग के द्वारा रक्त तत्काल जम कर शरीर की रक्षा करता है। हमारा मन अगर बार-बार हताशा, निराशा या चिंता के भवँर में उलझता हो तो दिमाग की अविरत उत्तेजना एड्रेनालिन का अधिक स्त्राव रक्त प्रवाह में करती है। जिसके कारण ह्रदय की धड़कन बढ़ना तथा उच्च रक्तचाप की तकलीफ शुरु होती है। जब एड्रेनालिन की मात्रा रक्त में बढ़ती है, जब हमारा जठर उसकी पाचनक्रिया का कार्य बंद कर देता है। अतः चिंतातुर व्यक्ति जब कुछ खाता है, खुराक बिना पचे ही पेट में पड़ी रहती है। अंततः कच्चा रस रक्त में मिश्रित होकर जोड़ों के दर्द का कारण बनता है। पाचन क्रिया की कार्यवाही बंद होने से यकृत में स्त्रवित पाचक उत्तेजकों की (Digestive enzymes) तीव्रता के कारण उसकी दिवार में छेद (Ulsers) हो जाते है। इन सारी परिस्थितियों में सर्वाधिक धक्का (Strain) ह्रदय को लगता है, अतः अगर ह्रदय को सलामत रखना हो तो हताशा को निकाल दो - मन को शांत रखो और नियमित ध्यान करो। दिमाग के अंदर पिच्युटरी के पास पीनीअल नामक ग्रंथी में से मेलोटोनीन नामक अति लाभदायी हॉर्मोन स्त्रवित होता है। जिससे शरीर के सभी अंगो की कार्य दक्षता में वृद्धि होती है। मेलोटोनीन ह्रदय रोग के हमले भी अटकाता है। स्टेनफर्ड युनिवर्सिटी के डॉक्टर फिलिप गोल्डीन खुद के दर्दी को सोशियल एन्ग्झाइटी डिसऑर्डर (SAD) मुक्ती पाने के लिये नियमित ध्यान करवाते है। कपाल के पास बाँई ओर दिमाग का ‘लेफ्ट प्रिफन्टल कोर्टेक्ष’ हिस्सा है। जहाँ मनुष्य को सुख शांति का अनुभव होता है। नियमित ध्यान करने वाले के दिमाग में यह विभाग अधिक चमकता है। आज तो अनेक रोगों में ध्यान दवाई की अपेक्षा अधिक असरकारक सिध्ध् हुआ है। ध्यान ही हमें जीवन जीने की कला सिखाता है। इसके लिये आवश्यकता है सिर्फ मानसिक अभिगम की (Mental attitude), कयोंकि हमारा मानसिक अभिगम ही हमें पूर्णतः मैालिक तरीके से सोचने की शक्ति प्रदान करता है!

यह भी एक हकीकत है कि चिंतातुर व्यक्ति को सीधे ही ध्यान करने की सलाह देना अव्यवहारिक है। ध्यान करने के लिये एक पूर्व भूमिका आवश्यक है। मन को चिंता, हताशा, गमगीनी जैसे नकारात्मक आयाम में से उत्साह, आनंद और प्रेम जैसे सकारात्मक आयाम में सरलता से ले जाने के लिये, अगर कोई सहजत्तम व्यायाम है तो वह है हास्य! स्टेनफोर्ड युनिवर्सिटी के डॉ. विलियम फ्राय कहते है: ‘हास्य खड़े-खड़े दौड़ने का व्यायाम है। अन्य व्यायाम की तरह हास्य के व्यायाम की स्थायी असर रहती है। हास्य से ब्लडप्रेशर नॉर्मल होता है, पुराना सर दर्द ठीक हो सकता है ।’ धी सायन्सीझ मानक मेगेझीन में डॉ.जेफ्री गोल्डस्टेन ने लिखा है: ‘हास्य से मनुष्य की आयु बढ़ती है। हास्य से बेटा ऍ़न्डोरफिन्स नामक कुदरती सत्त्व दिमाग में स्त्रवित होता है। जिससे हमें पीड़ाशामन स्थिति का अनुभव होता है। परिणाम स्वरूप हास्य द्वारा मानसिक तनाव कम होता है ।’ हमारे दाहिने दिमाग में हास्य का केन्द्र स्थित है। दिमाग के दाहिने हिस्से को हास्य द्वारा उत्तेजित किया जाए तो दिमाग में कई लाभदायी रसायण पैदा होते है। जिससे ह्रदय अधिकांश रोग ठीक होते है। शरीर ध्यान की पूर्व भूमिका रूप स्वस्थता पाकर ध्यान के लिये सुसज्ज होता है।