निवेदन

'श्री स्वामिनारायण डिवाइन मिशन' संस्था के स्थापक एवं आजीवन प्रमुख अ.मु.प.पू. श्री नारायणभाई आत्मा-परमात्मा के अखंड साक्षात्कार वाले, प्रबुद्ध, अनुभवसिद्ध तथा महान आर्षदृष्टा होने से, आध्यात्मज्ञान की वास्तविक पिपासा धारित मुमुक्षु साधकों के लिये प्रखर आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे। वे 'स्वामिनारायण धर्म' को संकुचित विचारधारा से न मानते हुए एक महान विश्वधर्म के तौर पर प्रतिपादित करते थे। उनकी दृष्टि विशद तथा सर्वधर्म समन्वयकारी थी। उनका अभिगम सदैव सर्वजीवहितावह ही था। वे कहते थे कि पूर्ण परब्रह्म परमात्मा तत्त्व एक ही है और वह अंतिम-सर्वोपरि सत्ता है। वह स्वरूप भगवान श्री स्वामिनारायण के रूप में पूर्ण स्वरूप से आविर्भाव को प्राप्त था। मनुष्यजीवन का सर्वोच्च ध्येय, सर्वोपरि परमात्मा के स्वरुप आत्यांतिक मोक्ष (Ultimate redemption) की स्थिति है। उस स्थिति की उपलब्धि परमात्मा के पूर्ण आविर्भाव (manifestation) के यथार्थ ज्ञान-ध्यान तथा शुद्ध उपासना के बिना संभव नहीं होती है। अतः इस स्वरुप की शुद्ध उपासना, उसका ध्यान एवं यथार्थ ज्ञान अनिवार्य है। मुमुक्षु को इस विषय पर गहनतापूर्वक विचार करना चाहिये।

पूज्यश्री नारायणभाई के पास विविध धर्म के अनुयायी भी आध्यात्मिक मार्गदर्शन के हेतु आते, उनके वात्सल्यपूर्ण सांनिध्य में बैठने भर से अनेक प्रश्नो के हल अंतःकरण में अपने आप हो जाते थे। संसार के त्रिविध ताप का शमन होकर अंतरात्मा में शितलता व्याप्त हो जाती, ऐसे अनुभव कई लोगों को हुए थे। वे स्वयं के अंतरंग सेवक के समक्ष कई बार आध्यात्मिक ज्ञान के गहन रहस्यों को प्रकट कर उनको उपकृत करते थे। इस दिव्य विचार संग्रह में से पूज्यश्री नारायणभाई की उपस्थिति में ही अंतरंग सेवक द्वारा, संकलित कई प्रेरक एवं सैद्धांतिक वचनों के आधार पर यह लघु पुस्तिका विविध विषय तात्पर्य के अंतर्गत की है। जो सरल होते हुए भी, उस का अर्थगांभीर्य दर्शित करती है। स्वामिनारायण धर्म के या अन्य सत्वगुणी सज्जनों को भी उपयोगी हो, मुमुक्षु - साधक तथा भविष्य की पिढियाँ इसका महद् लाभ उठाकर, स्वयं की जीवनयात्रा सफल बनाये, यही आशा। हिन्दीभाषी भी ईस ज्ञान से लाभान्वित हो इस आशय से यह हिन्दी अनुवादित पुस्तिका प्रकाशित करते हुए आनंद और गौरव की अनुभूतिकरते हैं।

सं. 2063, महा वद चौदश

ई. स. 2007, 16 फरवरी

प्रकाशन समिति

श्री स्वामिनारायण डिवाइन मिशन

अमदावाद