८. कुसंस्कार

पूर्वकर्म के संस्कार के कारण या संयोग के कारण दोष में लिप्त होकर जो कुसंस्कार रचित होते हैं वे अल्प एवं कमजोर होते हैं, परंतु जागृत रहकर, जानबूझ कर भोग में सुख तथा आनंद मानकर जो भोग भोगते हैं। उससे जो कुसंस्कार बनते हैं वे अति दृढ़ होते हैं। उनको दूर करने के लिये अधिक परिश्रम तथा दीर्घकाल लगता है।

किसी भी उत्पन्न होने वाली वस्तु का नाश निश्चित है। जिस वस्तु को बनाया जा सकता है, उसका नाश भी किया जा सकता है। इस सिद्धांतानुसार हम रचित कुसंस्कार को हमारे प्रयत्न द्वारा रोक भी सकते हैं, दुर्बल कर सकते हैं और नष्ट भी कर सकते हैं।

जिस प्रकार व्यक्ति खुद पर आने वाली सांसारिक - व्यावहारिक मुसीबत, दुःख, विघ्न आदि को अनेक प्रकार के उपाय से, स्वयं कष्ट सहकर भी दूर करता है। उसी प्रकार साधक को भी कुसंस्कार की समक्ष संघर्ष कर, प्रयत्नपूर्वक उसे दूर करना पडता है।

बाह्य दोषों के अलावा आंतरिकदोष तथा कुसंस्कार की मात्रा कई गुना अधिक होती है। अनंत जन्मों के सूक्ष्म संस्कारों को समाधि के बिना जाना भी नहीं जा सकता है, तो दूर करना तो दूर की बात है। प्रभु के स्वरुप में चित्तवृत्ति की एकाग्रता दीर्घकाल पर्यंत रहने पर ही समाधि होती है, ऐसी समाधि के समय अनंत जन्मों के संस्कारों का भान होता है। उन संस्कारों को दूर करने के लिये भी प्रभु की उपासना तथा ध्यान का ही सहारा लेना पडता है। अन्य उपाय सत्पुरुष की कृपा बरसना है। सेवा द्वारा सत्पुरुष प्रसन्न होते हैं और कृपा बरसाते हैं, फलस्वरुप अनेक जन्मों के कुसंस्कार नष्ट होकर साधक के चैतन्य को शुद्ध बनाते हैं।

अंतदृष्टि, तपस्या, संयम तथा प्रभु के स्वरुप का एवं मुक्तपुरुष के वचन का बल हो तो, साधक कुसंस्कारों के उफान के सामने भी लड़कर उसे परास्त कर सकता है। जब की उससे रहित व्यक्ति कुसंस्कारों के उफान के साथ भोगों की ओर आकर्षित हो जाता है।

प्रभु के स्वरूप के साथ अखंड सातत्य रखकर संलग्न रहने से अनंत जन्मों के कुसंस्कार क्षीण होते होते, अंततः नष्ट हो जाते हैं।

यथार्थ ज्ञान और प्रभु के बनाये नियम-धर्म तथा सत्पुरुष के संग और वचन का बल, कुसंस्कारों को हटाता है, अन्यथा पापकर्म से बचना अत्यंत दुष्कर है।

जो साधक यह सोचता है कि अनंत जन्मों के कुसंस्कार कैसे दूर होंगे? यह कार्य तो अति दुष्कर है। यह तो धीरे - धीरे कालानुसार जायेगा तब जायेगा। ऐसा नकारात्मक अभिगम रखने वाले साधक प्रयत्न में शिथिल बन जाते हैं। अंततः निराश एवं नाउम्मीद होकर मन की लडाई में निष्फल हो जाते हैं।