३. वैराग्य - विवेक
जब तक समझदारीपूर्वक का यथार्थ वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, तब तक प्रभु के स्वरुप में चित्त की वृत्ति का निरोध भी संभव नहीं है।
अनेक प्रकार की सांसारिक - व्यावहारिक व्यथा तथा प्रतिकूलता में बार-बार निराशा या उदासीनता होती रहे तो ऐसा भाव नकारात्मक होने से वैराग्य सिद्ध करने में बाधक होता है।
वैराग्य की सिद्धि के हेतु आत्मा - अनात्मा के ज्ञानरुपी सांख्यज्ञान तथा प्रभु के स्वरुप की ही तीव्र त्वरा अत्यंत आवश्यक है।
परमात्मा के स्वरुप के अतिरिक्त कहीं भी अणुमात्र भी आसक्ति न रहे, यह वैराग्य की चरमसीमा है।
समग्र संसार का त्याग किया हो, परंतु अंतरात्मा में तीव्र वैराग्य की दृढ़ता न हो तो सद्गुरु निष्कुलानंद स्वामी के कथनानुसार "त्याग न टके रे वैराग्य विना" (वैराग्य के बिना त्याग नहीं टिकता) ऐसा त्यागी जहाँ भी होगा संसार की रचना खड़ी करेगा, उसमें उलझ जाएगा।
बार-बार व्यंगात्मक वाणी का प्रयोग एवं मझाक - मसखरी साधक को वैराग्य की सिद्धि में हानिकर्ता है।
परमात्मा संबंधित रहस्यज्ञान में निरंतर गंभीर चिंतन, मनन तथा निदिध्यास वैराग्य उत्पन्न होने के कारण हैं।
सत्-असत् का विवेक एवं प्रभु के अतिरिक्त अन्य कहीं से भी आसक्ति दूर करने का अमोघ उपाय पूर्ण मुक्त स्थितिवाले सत्पुरुष के संगम-समागम एवं सेवा ही है।
सत्पुरुष के संगम-समागम एवं सेवा द्वारा ही आत्मनिरीक्षण, अंर्तदृष्टि तथा परमात्मा के स्वरूप संबंधित गहन चिंतन-मनन और निदिध्यास करने की योग्यता आती है।
सत्पुरुष की सेवा-समागम द्वारा उनकी कृपा प्राप्त होती है। उस कृपा द्वारा ही अध्यात्म ज्ञान के गहन रहस्यों के मर्म को जानने की सूक्ष्म बुद्धि का उदय होता है।
चित्तवृत्ति रुप ऊर्जा रागद्वेष तथा अहंकार के सहयोग से भौतिक पंचविषय की आसक्ति में आकृष्ट रहती है अथवा परलोक संबंधित ऐश्चर्य तथा सुखों की आसक्ति में ऊलझी रहती है। उसमें से निकलकर जब परमात्मा के स्वरुप में आकृष्ट होती है, वही सच्चा वैराग्य है।
चित्त की ऊर्जा को दमन द्वारा नहीं, अपितु जागृतिपूर्वक, भीतर की समझ तथा संयम के द्वारा भौतिक विषयों में से परावर्तित कर परमात्मा में संलग्न करे, वह वैराग्य है। नासमझी से अज्ञानपूर्वक कठोर तपस्या द्वारा इन्द्रियाँ या अंतःकरण का दमन करना वैराग्य नहीं है। ऐसे अज्ञानपूर्वक के दमन से तो शारीरिक तथा मानसिक शक्तियाँ क्षीण होती है तथा चित्तवृत्ति दुगने वेग से विषय में संलग्न होती है।
परमात्मा के सम्यक् ज्ञान द्वारा बुद्धि निर्मल होती है। ऐसी बुद्धि में आत्मा - परमात्मा का प्रकाश प्रज्वलित होता है, तब बुद्धि प्रकाशित होती हैं। उसे विवेक शक्ति (Analytical power) कहते हैं। ऐसा विवेक, साधक के लिये जो कुछ बाधक है, उसे दूर करने में सहायक होता है।