२. मुमुक्षुत्व जागृति

सहनशील, सुख-दुःखादि द्वंदो में स्थितप्रज्ञ, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि महाव्रतों का निष्ठापूर्वक पालन करनेवाला जिज्ञासु, मुमुक्षु व्यक्ति ही प्रभुप्राप्ति के मार्ग पर प्रगति कर सकता है। अन्य के लिये यह मार्ग अति दुष्कर है।

आध्यात्मिक प्रगति हेतु साधक को स्वयं अनेक प्रकार की मान्यता, ग्रंथियाँ एवं निश्चय को सत्पुरुष के समागम द्वारा तथा अंतदृष्टि द्वारा क्रमानुसार परिचित होना पड़ता है। विविध मान्यताओं को अनुभव की कसौटी पर परखना पड़ता है। तत्पश्चात ही मिथ्या तथा भ्रमित मान्यता -ग्रंथियाँ शिथिल होती है, मंदमति दूर होती है तथा यथार्थ ज्ञान में मति स्थिर होती है।

स्थूल बुद्धि से सूक्ष्म बुद्धि, कनिष्ट, प्रकार के आचरण से सत्पुरुष द्वारा समझाये गये पंचवर्तमान के* विशद अर्थ सहित उत्कृष्ट आचरण तथा परमात्मा के दिव्य स्वरुप संबंधित ज्ञान, कर्म और उपासना में निरंतर मति होने से क्रमशः ध्येय प्राप्ति की और अग्रसर होता है।

भगवान स्वामिनारायण के 'वचनामृत' के कथनानुसार सदैव भौतिक शरीर की अंतावस्था-मृत्यु अवलोकित करने वाला व्यक्ति सांसारिक बंधनो से मुक्ति की ओर, प्रभु प्राप्ति जैसे परिणाम स्वरुप लक्ष्य की और त्वरित गति से प्रगति करता है।

चित्त में कामादि विकार उद्भवित न होने देने का एक उत्तम उपाय यह भी है कि स्वयं को हमेंशा प्रभु प्रसन्नतारुप मानव कल्याणकारी सेवा कार्य में व्यस्त रखते हुए प्रभु प्राप्ति के महान ध्येय की परिपूर्ति हेतु सदैव प्रयत्नशील रहें।

व्यक्ति का अंतःकरण दिन के दौरान कई बार शुद्ध तथा अशुद्ध होते रहता है। एक ही व्यक्ति सुबह को देवतुल्य होता है तो शाम को शैतान भी हो सकता है। विपरित ज्ञान और क्रियाओं से मोहित होकर अशुद्ध होता है। सच्चे ज्ञान, कर्म तथा उपासना से वह शुद्ध होता है। अतः साधक को यह बात ध्यान में रखते हुए सदैव जागरुकता रखते हुए स्वयं का मूल्यांकन कर, सुधारते रहना चाहिए। इस प्रक्रिया को अविरत गतिमान रखने से निज ध्येय तक निश्चितरुप से पहुंच सकता है।

जीवन की सार्थकता के लिए साधक को अतिसावधान रहना आवश्यक है। जैसे मेरे लिये क्या देखना योग्य है, क्या देखना अयोग्य है, क्या सुनना योग्य है, क्या सुनना अयोग्य है, क्या खाना योग्य है, क्या खाना अयोग्य है, क्या बोलना योग्य है, क्या बोलना अयोग्य है, क्या जानना योग्य है, क्या जानना अयोग्य है, इस प्रकार विवेकपूर्वक जागरुकता रखकर इन्द्रियों के आहार शुद्ध रखने से अंतःकरण विशुद्ध बनता है। ऐसा अंतःकरण ही प्रभु के स्वरुप में एकाग्रता के योग्य बन सकता है।

इस जगत में अनेक प्रकार की चित्र-विचित्र घटनाएँ हंमेशा घटित होती रहती है, उसका भला-बुरा असर व्यक्ति पर होता है, परंतु साधक को सदैव जागरुक रहकर उसे निरीक्षित करते रहने की जरुरत है कि घटनाओं की क्या असर स्वयं पर होती है, मेरे प्रभुप्राप्ति संबंधित लक्ष्य में कहीं कोई शिथिलता तो नहीं आती? संयोगवश किसी घटना का अंतःकरण पर दुष्प्रभाव हो जाए तो तुरंत ही उसे दूर करने का प्रयत्न कर, दूर न होने तक निष्ठापूर्वक प्रयत्न करते रहना साधक का कर्तव्य है।

साधक को परमात्मा का साक्षात्कार होकर, सिद्ध मुक्त दशा उपलब्ध न होने तक, मुक्तपुरुष, सद्गुरु का निर्देशन तथा उनकी आज्ञा का यथार्थ पालन अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा निज ध्येय से विचलित होकर पतन की ओर अग्रसर होने की पूर्ण संभावना रहती है।

प्रारंभिक स्थिति में साधक सोचता है कि इस संसार के सुख, भोग का मैं त्याग करुंगा तो मेरे पास क्या बचेगा? एक ओर संसार के सुखों का त्याग किया, परंतु अभी परमात्मा के सुख की प्राप्ति की शरुआत भी नहीं हुई है, मेरे पास तो कुछ नहीं बचेगा, मैं रिक्त हो जाउंगा। ऐसे निर्माल्य विचार की उत्पति के समय ही सोचे कि भौतिक सुखों का प्रलोभन या उसकी आसक्ति छूटने पर वासना के क्षयरूप आनन्द की प्राप्ति होती है तथा चित्त में सात्त्विक प्रसन्नता निष्पन्न होती है, जो संसार के किसी भी बड़े-से-बड़े सुख से अधिक है।

नया साधक आरंभ में सत्संग सेवारुपी कार्य, चाहे कम ही करे, किन्तु अवश्य करे, क्योंकि प्रभुप्राप्ति के मार्ग में निष्कामभाव तथा निःस्वार्थभाव से किया हुआ कल्याणकारी कार्य अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। ऐसे कार्य से पूर्व कर्म के संस्कार क्षीण होते हैं तथा सात्त्विकभावउदित होते हैं। जो प्रभु के स्वरूप में संलग्न होने की भूमिका तैयार करते हैं।

प्रभु की प्रसन्नतारूपी कल्याणकारी सेवा कार्य किये बिना कोई सच्चा साधक बन नहीं सकता है। जिस प्रकार प्रभु अकारण ही कृपाकर हमें सत्यज्ञान, उपासना, भक्ति आदि प्रदान कर उपकृत करते हैं, उसी प्रकार हमारा कर्तव्य है कि अन्य के कल्याण तथा अभ्युदय के लिये निष्काम परोपकारी प्रवृत्ति करने का पवित्र कर्यव्य है। उसके द्वारा जगत में प्रभु के स्वरुप के सत्यज्ञान तथा उपासना की रक्षा होती है। अतः साधक पर प्रभु की प्रसन्नता एवं कृपा होती है।

स्वयं के कर्तव्य को भूलना, कार्य में शिथिल होना, प्रमाद के कारण कार्य की उपेक्षा करना, अल्प त्रूटियों को गंभीरता से लक्ष्य में न लेना आदि। इस प्रकार के मनोवर्तन साधक की गैरजिम्मेदारी, शुष्कता तथा प्रमाद को सूचित करता है जो साधना में बाधित होता है।

जो साधक निज कर्यव्य का अतिशय गंभीरतापूर्वक नीतियुक्त हो कर पालन करता है, श्रद्धा से, कर्तव्य प्रभु द्वारा सुपुर्द किया गया कार्य है, यह मानकर निष्ठापूर्वक पालन करता है, लौकिक दृष्टि से तो सफलता प्राप्त करता ही है, अपितु आध्यात्मिक मार्ग पर भी सफलता एवं उन्नति को प्राप्त करता है।

जिस प्रकार व्यक्ति स्वयं की उन्नति तथा सफलता की इच्छा सर्वप्रकार से रखता है, अवनति और निष्फलता की कामना कभी नहीं करता। ऐसी ही कामना अन्य के लिये भी करें तथा उसमें सहायक हो तो क्रमशः राग-द्वेष रहित होकर उन्नत होता है।

साधक का लौकिक व्यवहार भी अच्छा एवं नीतिपूर्ण होना आवश्यक है। फलस्वरुप, साधना में लौकिक - व्यावहारिक विक्षेप कम बाधित होते हैं तथा कुछ अनिवार्य व्यावहारिक सहायता भी मिलती है, जो साधन दशा में अपेक्षित है।

साधना करते हुए जो अनुभव तथा उपलब्धियाँ हुई हो उनकी स्मृतियाँ रखना आवश्यक है। वे साधना की शिथिलता एवं निराशा के समय में नये प्राण डालकर, नई आशा एवं ऊर्जा को संचारित करने में उपयोगी होती है।

जो साधक देह संबंधित भौतिक पदार्थ तथा लौकिक संबंधो के प्रति आसक्ति को पूर्व तैयारी कर, मन में से एकबार भी दूर नहीं कर सकता। उसकी आगे की प्रगति अवरोधित हो जाती है। बार-बार सांख्यज्ञान के द्वारा प्रयत्नपूर्वक आसक्ति को दूर करना चाहिए। इस प्रकार अविरत करते रहने से दृढ़ता आती है तथा अंततः उस में जीत होती है।

किसी भी दुर्गुण को त्यागने तथा सद्गुण को ग्रहण करने के प्रयत्न में असंख्य बार निष्फलता मिलने पर भी निराश या हताश हुए बिना अविरत प्रयत्न करनेवाले को सफलता निश्चितरूप से मिलती है।

परमात्मा स्वरूप की प्राप्ति के सिवा अन्य सभी लौकिक या अलौकिक, भौतिक या अधिभौतिक प्राप्ति की इच्छा ही न रहे तो सच्चा मुमुक्षत्व जागृत होता है।