७. दोष
काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि आंतरिक दोष तो जिसपर भगवान कृपा करें उसके ही टलते हैं, यह मानकर उसे टालने का विधेयात्मक पुरुषप्रयत्न न करे और ऐसी हिंमतरहित बात अन्य से भी करे, वह स्वयं को तथा अन्य को भी अन्याय करता है। भगवान स्वामिनारायण ने ऐसी हिंमत रहित बात करने वाले को सत्संग में कुसंग समान कहा है।
आंतरिक दोष तो स्वाभाविकरुप से सभी में होते ही हैं। ऐसा मानकर उनके साथ (दोषों के साथ) समझौता - समाधान कर ले तो उन दोषों को कभी भी जीत नहीं सकते हैं।
दोष होते हुए भी लोकैषणा की खातिर स्वयं को निर्दोष एवं सर्वगुण संपन्न होने का दंभ-दिखावा करे, तो साधक अवश्य ही पतन को आमंत्रित करता है।
सभी में दोष ही भरे हैं, ऐसी संकुचित दृष्टिवाला व्यक्ति अन्य के दोषों को त्यागकर, मात्र गुणों को कभी भी ग्रहण नहीं कर सकता है।
देहाभिमानी व्यक्ति को सभी के बीच में उसके दोष दृष्टिकृत करवाये तो स्वयं को अपमानित मानकर दोष दृष्टिकृत करवानेवाले के प्रति द्वेष करेगा। जब की सच्चा साधक ऐसी परिस्थिति में स्वयं को सुधारने का प्रयत्न करेगा।
सज्जन व्यक्ति की तरह प्रभु भी दिव्यरूप से सहायता कर सकते हैं। ऐसा विश्वास व्यक्ति में न होने के कारण उसकी प्रगति मंद हो जाती है।
जिसे स्वयं की त्रूटियाँ तथा दोषों के प्रति चिढ़-कुभाव या खिन्नता उत्पन्न नहीं होती। वह कभी भी सुधर नहीं सकता है।
सत्पुरुषों द्वारा दर्शित प्रभुप्राप्ति के मार्ग के अलावा, मैं भौतिक विज्ञान की मदद से नया, संक्षिप्त, अनोखा मार्ग खोजकर त्वरित सफल हो जाऊँगा। यह सोचकर सत्पुरुष द्वारा दर्शित मार्ग की अवगणना कर, मनस्वी साधना करने वाला अधिक विघ्न तथा विक्षेपों में फँसता है और आखिरकार ऐसी साधना में निष्फल होता है। क्योंकि सत्पुरुष द्वारा दर्शित मार्ग अनुभव सिद्ध और सत्य होता है एवं साधक का स्वयं का मार्ग कल्पित तथा मिथ्या होता है।
जो व्यक्ति स्वबचाव के हेतु निज दोषों का समर्थन करने लगता है, वह पक्षपाती, ज़ीद्दी एवं दुराग्रही बन जाता है। अपूर्ण स्थिति में, अल्प योग्यता में, मान-सन्मान की अल्प इच्छा भी यदि विद्यमान हो, तो जब अधिक योग्यता प्राप्त हो, तो यह इच्छा भी तीव्रता धारण कर लेती है, जो साधक को प्रगति में बाधक होती है।
वाच्यार्थ ज्ञान को अनुभव का विषय बनाकर लक्ष्यार्थ न बनाये तब तक साधक की उस दिशा में कोई प्रगति संभव नहीं है।
मुख्य विषय एवं गौण विषय को जो वास्तविक रुप से नहीं पहचानता, उसके समय तथा शक्ति दोनों का व्यर्थ व्यय होने के कारण निष्फल होता है।
अति विश्वास (over confidence) तथा अति आशा में मिथ्याभिमानी न हो जाए। इसका ध्यान रखना चाहिए। मिथ्याभिमान रुप दोष से बचने के लिये सर्वस्व प्रभु को अर्पित करना चाहिये। सर्व गुण तथा सामर्थ्य प्रभु के ही हैं मेरा कुछ भी नहीं है, He is everything and I am nothing ऐसा दासभाव दृढ़ करें।
पुरुषार्थ और परिश्रम से कायर होनेवाला व्यक्ति सत्पुरुष द्वारा दर्शित मार्ग पर चल नहीं सक्ता है। जहाँ है वहीं रह जाता है।
कई बार कठोर वाणी एवं उद्धत वर्तन करते हुए भी व्यक्ति, उस विषय के प्रति जागरुक नहीं होता है, यह बड़ा दोष है। यह दोष उसके लिये अनेक समस्याएँ लाता है।
आंतरिक दोषों को परमात्मा के दिव्य स्वरुप का साक्षात्कार किये बिना, पूर्णतः कभी भी नष्ट नहीं किया जा सकता।
परमात्मा संबंधित आध्यात्म की बातें, हमारे इस लोक में किसी स्वार्थ पूर्ति के हेतु सीमित रहें और प्रयोजन पूर्ण होने के साथ ही गौण हो जाए, तो साधक के लिये यह बड़ा दोष है, उसे प्रयत्नपूर्वक दूर करना ही चाहिए।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान आदि आंतरिक दोषों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात भी, जब तक आत्मा में प्रभु के स्वरुप का साक्षात्कार नहीं होता है, तब तक उसमें असावधान रहकर, यह मानने लगे कि मैं तो पूर्णतः निर्लेप हूँ, मुझे कुछ भी विक्षेप नहीं कर सकता है। ऐसी मान्यता भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यह एक बड़ा दोष है इसे दूर करना ही चाहिए।