९. आत्मनिरीक्षण
अतिशय मंदबुद्धि वाले तथा पशुतुल्य प्रकृति के मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी मनुष्य, अगर सत्पुरुष एवं सत्शास्त्र द्वारा दर्शित उपदेशों को समझने का प्रयत्न करे तो वे आत्मनिरीक्षण द्वारा सत्-असत् सब कुछ जानकर स्वयं का उत्कर्ष कर सकते हैं।
सांसारिक विषयभोग सुखाभासी होते हुए भी दुःखरूप तथा नाशवंत ही है। केवल परमात्मा का स्वरूप ही शाश्वत सुख तथा अविचल शांति का कारण है। ऐसा ज्ञान साधक को आत्मनिरीक्षण द्वारा होता है।
आत्मनिरीक्षण द्वारा साधक स्वयं का ध्येय निश्चित कर, उसके प्रति संपूर्ण जागरुक रहकर, आलस्य-प्रमाद में आकृष्ट न होकर सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य, प्रभुप्राप्ति को सिद्धकर सकता है।
निष्फलता, क्लेश, पतन, जो भी होते हैं, उनके मूल में केवल स्वयं का अज्ञान एवं अविद्या ही विद्यमान है तथा जितनी भी सुख, शांति, सफलता, प्रगति होती है, उनके मूलमें ज्ञान विद्यमान है। आत्मनिरीक्षण द्वारा व्यक्ति स्वयं किस स्थिति में है, यह जान सकता है तथा अज्ञान - अविद्या को दूर कर उच्चतर स्थिति में प्रवेश कर सकता है।
साधक को आत्मनिरीक्षण द्वारा जानना चाहिये कि वह दोषों और क्षतियों के साथ समझौता-समाधान (Compromise) तो नहीं कर रहा है? दोषों के प्रति सचेत रहकर, ज़रुरत हो तो कठिन अभिगम अपनाकर भी उसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। सच्चा साधक स्वयं में दोष या अविद्या को बिलकुल भी सह नहीं सकता है।
साधक को आत्मनिरीक्षण द्वारा दृष्टिकृत करते रहना चाहिए कि वह ध्यान-भजन, स्वाध्याय आदि प्रभुप्रसन्नता के उपाय प्रसिद्धि की लालच या किसी आडंबर या लोगों के दिखावे के लिये तो नहीं करता है? ऐसी जागृति की साधक में कमी होगी तो वह दंभ का संवर्धन करेगा और उन्नति के स्थान पर अवनति की और अग्रसर होगा।
कुछ अंश तक आध्यात्मिक अनुभूति होते हुए भी साधक को आत्मनिरीक्षण द्वारा अविरत यह जागृति रखनी आवश्यक है कि पूर्ण हो जाने के मिथ्या भ्रम या मान्यता में तो नहीं है न?
आत्मनिरीक्षण द्वारा साधक को यह परीक्षण करते रहना चाहिए कि प्रभु के कल्याणकारी गुणों को जीवन में कितने आत्मसात किये हैं और कितने दोष निष्कासित करने बाकी हैं। यह परीक्षण करते हुए, गुणों को आत्मसात कर, दोषों को दूर करने का अविरत निष्ठापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए।