६. कुछ सिद्धांत
शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म और शुद्ध उपासना द्वारा ही साधक परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है, अन्यथा नहीं।
जगत संबंधित सांसारिक भोग तो असंख्य लोगों को प्राप्त होते हैं, परंतु परब्रह्म का साक्षात्कार अनुभव ज्ञान तथा उससे संबंधित शाश्वत दिव्य सुख-शांति तो किसी विरल व्यक्ति को ही उपलब्ध होती है।
नए साधक को प्रारंभ में ऐसे भाव होते हैं कि, प्रभुप्राप्ति में सुख-शांति-आनंद है ही, परंतु लौकिक पदार्थ तथा भोगों में भी सुख तथा आनंद है। अतः दोनों को साथ रखकर चले, जिससे उभय में सफलता प्राप्त हो, परंतु ऐसा हो नहीं सकता है। साधना की परिपक्वता होने पर यह भ्रांति टूटती है।
श्रेयमार्ग पर सच्चा प्रयत्न करनेवाला ही प्रेयमार्ग (भौतिक भोगों के मार्ग) से बच सकता है। श्रेयमार्ग की रूचि में तथा प्रयत्न में शिथिलता आने से व्यक्ति श्रेयमार्ग की ओर से प्रेयमार्ग की ओर चलित हो जाता है।
जिस साधक में परमात्मा के कल्याणकारी गुणों को आत्मसात करने के पुरुषार्थ का अभाव, इन्द्रियों के आहार की शुद्धि, मनोनिग्रह और अनुशासन का अभाव है। वह भौतिकवाद की आँधी के सामने टिक नहीं सकता है, पंचविषय का योग होते ही साधना छोडकर भोग में उलझ जाता है।
जो लोग यह कहते हैं कि हम मोक्ष की इच्छा नहीं करते हैं। उनका यह कथन सत्य विच्छिन्न है। क्योंकि वे भी सांसारिक दुःखो से मुक्ति के इच्छुक हैं ही।
प्रभुप्राप्ति के ध्येयवाला व्यक्ति जैसा निष्काम कर्म कर सकेगा वैसा निष्काम कर्म, ऐसे उत्कृष्ट ध्येय रहित वैज्ञानिक भी कभी नहीं कर सकता है।
हज़ारों भौतिक वैज्ञानिक मिलकर समाज का जितना उत्कर्ष कर सकते हैं, परमात्मा के साक्षात्कार वाला एक संत उससे कहीं गुना अधिक समाज का अभ्युदय कर सकता है।
व्यक्ति सदैव हानिकारक, कष्टदायी, दुःखदायी लगते पदार्थ तथा संबंधो को दूर करने का प्रयास करता दृष्टिगोचर होता है। अगर ऐसा प्रयास दृष्टिगोचर न हो तो यह स्पष्ट है कि उस व्यक्ति को हानिकारक तथा कष्टदायी पदार्थ अथवा संबंधो की समझ नहीं है। वह व्यक्ति मोहवश है।
अज्ञानवश होते अधर्म से जल्दबाज़ी तथा असावधानी के कारण होता अधर्म पतन की ओर अधिक ले जाता है, उससे भी अधिक समझदारी से, जानबुझ कर किया गया अधर्म निश्चित रुप से अधःपतन की स्थिति के लिये जोखिमकारक तथा जिम्मेदार है।
अविरत सत्कर्म करते रहने से दोष दबे रहते हैं। सत्कर्म करना छोड़ देने से दबे हुए दोष सिर उठाकर हमें दबाने की कोशिश करेंगे। जिस प्रकार परिश्रम करते रहने से आलस्य नहीं रहती, परंतु परिश्रम करना छोड़ देने से तुरंत ही आलस्य उत्पन्न होती है, यह एक नियम है।
जो साधक मृत्यु के भय से रहित है, वही महाव्रतों के नियमों का तथा आज्ञाओं का पालन कर प्रभुप्राप्ति के मार्ग में प्रगति कर सकता है। उसके पश्चात प्रभु के स्वरुप की शुद्ध उपासना, शुद्ध ज्ञान, शुद्ध वैराग्य तथा शुद्ध कर्म अपेक्षित है।
प्रभु सामान्य रुप से सभी की सहायता करते रहते हैं। चाहे कोई उनके नियमों का पालन करे या न करे, परंतु जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक तथा निष्ठापूर्वक प्रभु की आज्ञाओं का एवं नियमों का पालन करता है, उसपर निज कृपा, प्रसन्नता बरसा कर उसकी अनेक विशिष्ट प्रकार से सहाय एवं रक्षा करते हैं, यह बात निश्चित है।
व्यक्ति स्वयं की शक्ति द्वारा - संतो, सत्शास्त्रों, साधना आदि की सहायता से स्वयं का आत्मिक उत्कर्ष साधने का प्रयत्न कर सकता है, परंतु स्वयं परमात्मा की या मुक्तपुरुष की कृपा तथा सहायता से जो उत्कर्ष प्राप्ति होती है, उसकी बात ही न्यारी है।
प्रभु के साथ संबंध जोड़ने से उनकी सहायता तथा रक्षा प्राप्त होती है, यह उस प्रकार है, जैसे बालक को श्रेष्ठ तथा योग्य माता-पिता मिलने से सहाय और रक्षा मिलती है, अन्यथा प्रभु की सहायता के अभाव वाला व्यक्ति तो अनाथ बालक जैसा है, जो सहायता के लिये यहाँ-वहाँ भटकते रहता है।
जो व्यक्ति समझदार होते हुए भी जगत संबंधित पंचविषय के भोगों में मोहवश होकर आसक्त होता है, उसे प्रभु की सहायता मिलनी संभव नहीं है।
शुभ होते हुए भी सकाम कर्म करनेवाला अशुभ कर्मो से पूर्णतः बच नहीं सकता है। अशुभ कर्मो से पूर्णतः बचने का उपाय मात्र निष्काम भाव ही है।
अडिग श्रद्धा, विश्वास और शुद्ध प्रेम बिना न तो किसी प्रकार का सफल आचरण होता है, न किसी प्रकार की प्रगति।
मनुष्य स्वयं ही अनेक प्रकार की समस्याओं का जाल बुनता है एवं मोहवश हो कर उसमें फँसा रहता है।
राग-द्वेषयुक्त स्थिति में बुद्धि अध्यात्मिक रहस्य की गहनता को स्पर्श नहीं कर सकती है। राग-द्वेष रहित शुद्ध बुद्धि ही सूक्ष्म होने के कारण आध्यात्मिक रहस्य को वास्तविक अर्थ में पाने को समर्थ है।
सत्पुरुष की आज्ञाओं का यथार्थ पालन होने से उनकी कृपा होती है। उस कृपा से शुद्ध बुद्धि का उदय होता है, जिससे आध्यात्मज्ञान के रहस्य सरलता से समझ में आते हैं।
समाज पर सबसे बड़ा परोपकार यही है कि प्रभु, सत्पुरुष तथा सत्शास्त्र द्वारा दर्शित उच्च आदर्श को प्रथम स्वयं के जीवन में चरितार्थ करें, तत्पश्चात उसी प्रकार से जीवन जीने की राह अन्य को दर्शित करें। अन्यथा समाज का पतन रूकना संभव नहीं है।
विषयभोगों को मुख्य मानने से व्यक्ति के लिये पाप-पुण्य की परिभाषा का कोई मतलब नहीं रहता है अथवा वह मनस्वी तरीके से उनकी व्याख्या करने लगता है। स्वयं अनुचित राह पर चलकर, अन्य को भी अनुचित राह दर्शित करता है।
सच्चे साधक निज ध्येय एवं आदर्शो में से कभी भी विचलित नहीं होते हैं। इनके लिए मृत्यु भी गौण हो जाती है और वह निर्भय हो जाता है।
हितेच्छु तथा निर्भय व्यक्ति ही अन्य को उसके दोष दृष्टिकृत करवाता है। राग-द्वेष से भयभित तथा खुशामदी व्यक्ति अन्य को उसके दोष के प्रति जागरुक नहीं बना सकता है।
प्रभुप्राप्ति के हेतु पुरुषार्थ करनेवाला साधक प्रभुप्राप्ति में बाधक संबंध या पदार्थ के प्रति द्वेष करे तो उसकी प्रगति अवरोधित होती है, अतः द्वेष न कर, विवेकपूर्वक उसका त्याग करने की राह ढूंढनी आवश्यक है।
स्वयं के ईष्टदेव की उपासना और श्रद्धा श्रेष्ठ प्रतित होती हो, तथापि साधक को अन्य धर्मो के मत के प्रति द्वेष भाव न रखते हुए सहिष्णु होना चाहिए, अन्यथा साधना में विक्षेप होता है। अतः सर्वधर्म आदर की विशाल दृष्टि अपना कर, साथ - साथ में स्वयं के ईष्टदेव के प्रति श्रद्धा में एवं उपासना में भी स्थिर और दृढ़ होना चाहिए।
जीव, ईश्वर और माया के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान सत्पुरुष के पास से ग्रहण करने के पश्चात का सोपान पुरुषार्थ ही है। तत्पश्चात ही प्रभु की कृपा उसपर बरसती है।
सत्पुरुष के आदेशों की अवगणना कर प्रभुकृपा की प्राप्ति का प्रयत्न, आकाशकुसुमवत् निरर्थक तथा असंभव है।
भगवान स्वामिनारायण के दिये गए पंचवर्तमान - मदिरा, माँस, चोरी, व्यभिचार, भ्रष्ट न होना तथा भ्रष्ट न करना, इनमें योगमार्ग के यम-नियम तथा सत्य, अहिंसा आदि सभी गुण समाविष्ट हैं। इन पंचवर्तमान में स्थित सूक्ष्म आध्यात्मिक अर्थो का रहस्य सत्पुरुषों के पास से समझ कर, उनका यथार्थ पालन कर अंतवृत्ति से प्रभु के स्वरूप में संलग्न होना ही सर्वश्रेष्ठ साधना है। अन्य साधना इसके समक्ष गौण है।