१०. योग्य - अयोग्य व्यवहार

व्यक्ति को विवेक दृष्टि रखकर जो वस्तु जितनी लाभदायी हो उसे उतना ही महत्व देना चाहिए। परमात्मा का स्वरूप तो सर्व से अधिक लाभप्रद है। अतः जीवन में उसे सर्वोच्च महत्त्व देना चाहिए तथा उसकी प्राप्ति के हेतु विशेष पुरुषार्थ करना चाहिए, यही यथायोग्य व्यवहार कहा जाए।

परमात्मा के साथ समुचित संबंध बाँधने के हेतु, उनके द्वारा हमारे लिए निर्मित कर्यव्य को निष्ठापूर्वक करना तथा अन्य अकर्तव्य को विवेकपूर्वक त्यागना आवश्यक है।

जो व्यक्ति नीति तथा न्याय बुद्धि छोड देता है वह मनुष्यत्व से भी दूर हो जाता है। परमात्मा तथा मुक्तपुरुष अन्य किसी से भी अधिक, हमारे सर्वोच्च हितेच्छु हैं। उनके वचन का अनादर करना या उनके द्वारा निर्मित नियम भंग करना अन्याय बुद्धि, अधर्मपूर्ण एवं अयोग्य व्यवहार है।

परमात्मा तथा सत्पुरुष के साथ का उचित व्यवहार मनुष्य के लिये परम ध्येय परिपूर्ण करने का अमोघ एवं निश्चित उपाय है। योग्य व्यवहार से सफलता और अयोग्य व्यवहार से निष्फलता निश्चितरुप से मिलती है। परमात्मा के साथ का संबंध स्वामी-सेवक का, उपास्य-उपासक का या पिता-पुत्र का रखना, साधक के लिये अति उपयोगी एवं आवश्यक भी है।

उपर्युक्त कथनानुसार संबंध परमात्मा के साथ कैसा और कितना रहता है। यह आत्मनिरीक्षण के द्वारा साधक जान सकता है। अगर साधक को ऐसा संबंध रखने में त्रूटि रहे, तो उसका प्रभु के साथ व्यवहार अयोग्य है।

प्रभु की उपासना, ध्यान, भक्ति आदि करते - करते किसी उच्च गुण की प्राप्ति हो औरउसका मान-सन्मान हो, तब वह सत्पुरुष को गौण मानकर स्वयं को मुख्य माने, तो प्रभु के प्रति अयोग्य व्यवहार कहा जाए और उसे प्रभुप्राप्ति अलभ्य होती है।

परमात्मा तथा सत्पुरुष का कोई अज्ञानी द्वेषी व्यक्ति अपमान करे, निंदा करे, अनुचित बोले या अवगुण ले उसे विवश हो कर निर्माल्यता पूर्वक सुनता रहे और उसका विरोध न करे, तो वह भी प्रभु एवं सत्पुरुष के साथ अयोग्य व्यवहार माना जाए। ऐसे निर्बल तथा डरपोक साधक के लिए प्रभुप्राप्ति का मार्ग दुष्कर है।

प्रभु तथा सत्पुरुष की जिसमें प्रसन्नता एवं रूचि न हो ऐसा कृत्य शायद व्यावहारिक या दुनिया की दृष्टि से उचित हो, तथापि ऐसा कृत्य करना अयोग्य व्यवहार है। अतः जिसमें प्रभु तथा मुक्तपुरुष की प्रसन्नता हो वही कृत्य करना चाहिए।

प्रभु के स्वरुप में आंतरिक वृत्ति से जुड़ने का प्रयास करने वाले साधक का दुनिया के संबंधो के प्रति व्यवहार भी योग्य ही होगा। क्योंकि प्रभु कृपा से ऐसे साधक की वाणी तथा वर्तन में सच्चाई, सरलता एवं माधुर्य प्रकट होता है।