९. कुरीति एवं व्यसन से मुक्ति
हिंदु धर्म के किसी शास्त्र में सती होने का विधान नहीं है। यह रीति धर्म मूलक नहीं, अपितु कुरीति मूलक है। पति के साथ सती होनेवाली स्त्री का मोक्ष नहीं होता। विधवा स्त्री को तो सती होने के बजाय मन-कर्म-वचन से प्रभु को पति के रुप में मानकर हरिभक्ति करना चाहिए। ऐसा बोधकर, उन्होंने पति के साथ सती होने की अमानुषी रीति को बंध कराने के लिये लोगों को समझाया।
उस जमाने में काठीओं (एक जाति) में कन्या का जन्म होते ही दूध पीलाकर मारना अर्थात् उसकी बालहत्या करने का क्रुरतापूर्ण रिवाज था, कारण यह कि, बेटी के विवाह में उन लोगों को बहुत अधिक खर्च होता था। सहजानंदजी ने किसी के वश में न आ सके ऐसी लडायक तथा शूरवीर काठी जाति पर अपना अलौकिक प्रभाव डालकर उस दुष्ट तथा क्रुर कुरीति को रोका।
विवाह के प्रसंग में गानेवाले बीभस्त गीतों तथा अश्लील शब्दों के प्रयोगवाले गानों के प्रति सहजानंदजीने सख्त विरोध जगाकर उसे बंध करवाया। उसके स्थान पर, उस प्रसंग में, राधा-रुकिमणी विवाह जैसे प्रेरक गीतों की रचना अपने संत-कविओं के पास करवाकर उन्हें गाने का आदेश उन्होंने दिया।
निर्मल जीवन के लिए व्यसन मात्र वर्ज्य है यह कहकर उसका उन्होंने दारु, अफीम, गाँजा, तंबाकू आदि जीवन को पायमाल करनेवाले द्रव्यों के सेवन से मुक्त कर के निर्व्यसनी बनाया।