३२. समकालीन महान संत-परमहंसो के स्वानुभव क्या कहते हैं यह देखें -
हरिलीलाकल्पतरु : रामानंदस्वामी का अनुभव -
रामानंदस्वामी लालजी भक्त को इस प्रकार कहने लगे :
स इत्यथाऽवदद् भक्तं मतः कृष्णो यथाऽधिकः ।
तथाऽत्यधिक एवेशात् तस्माद्दपि स विद्यते ॥
‘हे भक्त! जैसे श्रीकृष्ण भगवान मुझसे बडे हैं, वैसे लोज में आए हैं वे नीलकंठ ब्रह्मचारी, गोलोकधामनिवासी, श्रीकृष्ण भगवान से भी अधिक बडे हैं।’
पुनः स्वामी आगे कहते हैं :
सर्वेषामवताराणां कारणं च परात्परः ।
सोऽपाकृतगुणैश्वर्यो विद्यते पुरुषोत्तमः ॥
‘हे भक्त! वे ब्रह्मचारी तो दिव्य गुण ऐश्वर्यवाले सर्व अवतारों के कारण हैं तथा परात्पर पुरुषोत्तम परमात्मा हैं।’
सद्गुरु गोपालानंदस्वामी की बातें
वार्ता 167 -
एक हरिभक्त ने स्वरूपानंदस्वामी से पूछा : ‘यह श्रीजीमहाराज का अवतार कैसा समझना चाहिए?’ तब स्वरूपानंदस्वामी ने कहा, ‘यह अवतार नहीं, यह तो रामकृष्णादिक सभी अवतार के अवतारी प्रगट पुरुषोत्तम हैं; तथा अन्य अवतार जैसी कला तो स्वयं के भक्त द्वारा बताई है।’
वार्ता 168 -
एक समय एक साधु ने कहा : ‘¨मुझे तो सारा ब्रह्मांड दिखता है।’ तब व्यापकानंदस्वामी बोले : ‘आपको तो एक ब्रह्मांड दिखता है और मुझे तो अनंत आश्चर्य, अनंतकोटि ब्रह्मांड तथा गोलोकादि धाम हस्तामलवत् दृष्टिकृत हैं। यह तो रामकृष्णादि सभी अवतार के अवतारी श्री सहजानंद पुरुषोत्तम की मूर्ति के ध्यान का प्रताप है।’
श्री सहजानंदस्वामी के प्रश्न का साधुओं द्वारा दिया हुआ सुंदर उत्तर -
स्वयं सहजानंदस्वामी ने एक समय साधुओं से प्रश्न किया : ‘हमने अन्य अवतारों सदृश पराक्रम नहीं किये, समुद्र पर बाँध नहीं बनाया, दस मस्तक का रावण नहीं मारा, मंदराचल को पीठ पर नहीं धरा, कंस, शिशुपाल का वध भी नहीं किया। तथापि आप हमें क्यों परमेश्वर कहते हो?’
साधुओं ने उत्तर दिया : ‘राम ने रावण को मारा, किंतु वह रावण तो काम एवं अभिमान से पराजित ही था। वामन ने बलि को छला, किंतु वह तो लोभ मोह से छला हुआ ही था। कृष्ण ने कंस, शिशुपाल का वध किया, किंतु मानादिक षड्रिपुओं ने उनका वध कर ही दिया था; उस काम, क्रोध लोभ, मोह आदि हमारे अंतःशत्रुओं को आपने मारा। अतएव हम आपको अवतारी कहते हैं। आपने समुद्र पर बाँध नहीं बाँधा, किंतु आपने भवसागर तथा प्रभु के धाम के बीच सीधी राह बना दी है। आपने मंदराचल या गोवर्धन पर्वत धारण नहीं किया, किंतु हमारे पापपर्वतों को क्षण में हटाकर हमारे चित्त को शुद्धकर दिया है। अतः हम आपको प्रकट पुरुषोत्तम कहते हैं।’
हरिस्मृतिचिंतामणी में सद्गुरु निष्कुलानंदजीने गाया है कि -
‘अलौकिक मूर्ति आजनी, धरी धर्मकुमार;
जोतां ना’´वे जोड्यमां, आ सम अन्य अवतार।
समर्थ मूर्ति सुखभरी, धरी न धरशे कोई;
सर्वोपरी छे श्रीहरि, सहजानंद प्रभु सोय।’
(अर्थ : आज अलौकिक मूर्ति धारण किए धर्मकुमार अन्य सभी अवतारों में अतुल्य हैं। ऐसी समर्थ सुखभरी मूर्ति न किसी ने धारण की है न कोई धारण कर सकेगा। श्रीहरि सहजानंद प्रभु सर्वोपरी हैं।)