३०. सहजानंदस्वामी का अलौकिक प्रभाव तथा ऐश्वर्यदर्शन
भगवान का पृथ्वी पर जब प्राकट्य होता है, तब अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जीवों को आकर्षित करने की तथा उनके जीवन को परिवर्तित करने की उनमें शक्ति होती है। स्वामिनारायण में ऐसी शक्ति तथा सामर्थ्य सहज ही प्रतीत होता था। निम्नलिखित घटनाएँ उस शक्ति के उदाहरण के रूप में बताई हैं।
1. सहजानंदस्वामी की अलौकिक कांति, प्रखर प्रतिभा, ज्ञान की गंभीरता तथा सद्गुणों का स्वामित्व दृष्टिकृत कर असंख्य लोगों ने स्वयं को उनके चरणारविंद में अर्पण किया। बडे-बडे महंत, मौलवी, साधु, वैरागी, सन्यासी, शक्ति के उपासक, अनेक मतपंथी तथा श्रीमंत गृहस्थाश्रमी, सत्ताधारी तथा भयंकर लूटेरें भी अपनी-अपनी अपूर्णता को पहचानकर इस पूर्णस्वरूप की शरण में आए।
2. स्वामिनारायण ने हजारों मनुष्यों के जीवन में मूलभूतरूप से जीवन परिवर्तनकर उनमें नव चैतन्य का प्रागट्य किया था। उनके उपदेश से अनेकों को शांति एवं समाधान हुआ था। उनके प्रताप से कई भक्त समाधिनिष्ठ, कई निरावरण दृष्टिवाले, कई त्रिकालज्ञ, कई सत्यसंकल्प, कई मूर्तिमान वैराग्य जैसे, कई परमेश्वर में अखंड वृत्ति रखनेवाले; तो दूसरे अनेक रजोगुण, तमोगुण के मलिन भाव व्याप्त न हों ऐसे हुए थे। मांगरोल के गोरधनभाई जैसे कई मूर्ति के साथ तदात्मकभाव को प्राप्तकर चूके थे।
3. वैरागीओं की ओर से साधुओं को होते त्रास के दुःख को टालने के हेतु, साधुओं को परमहंस की दिक्षा देना आवश्यक लगा। इसलिए स्वामिनारायण ने कालवाणी गाँव में एक रात्रि पांचसौं त्यागी साधुओं को एक साथ परमहंस के स्वरूप की दीक्षा दे दी। कंठी उपवीत तथा शिखा का त्याग कराया, मूर्ति की प्रत्यक्ष पूजा के स्थानपर मानसी पूजा की विधि सिखाई। स्वामिनारायण के अलौकिक प्रभाव के कारण इन भागवती दीक्षाधारी संतो को कंठी, उपवीत तथा पूजा का त्यागकर, नई दीक्षा लेने में विलंब नहीं हुआ। यहाँ टिप्पणी आवश्यक है कि श्री स्वामिनारायण के एक वचन मात्र से इन परमहंसो में से कई लग्नमंडप से मींढल (लग्न की विधि में बाँधा जानेवाला विशिष्ठ सूखा फल) तोडकर आए हुए युवान थे; कई अपनी खडी फसल छोडकर आए किसान थे; कई श्रीमंत गृहस्थ थे; कई गाँव-जागीर छोडकर आए राजदरबारी थे। दूसरे अनेक स्वामिनारायण के खत को पढकर पानी पीने भी न रुकते हुए, त्यागी होने चल पडे थे।
4. सहजानंदस्वामी ने शैवों, शाक्तों, मुसलमानों, जैनों आदि को दृष्टिमात्र से समाधि कराकर सभी को उनके इष्टदेव के दर्शन कराए तथा स्वयं के स्वरूप में लीनकर बताये।
5. अगतराई में पर्वतभाई नामक भक्त को तथा नागकडा में व्यापकानंदस्वामी को स्वयं के दिव्य स्वरूप में से चौबीस अवतारों को प्रकट होते हुए दिखाये तथा पुनः दिव्य स्वरूप में लीन हो गए ऐसे दर्शन कराए।
6. लोगों को सन्मार्ग पर मोडकर परमात्मा के स्वरूप में जोडने के लिए स्वामिनारायण ने समाधि प्रकरण चलाया था, जिसके कुछ उदाहरण देखें :
श्रीजी को देख अनेक मनुष्य, चिडियाँ, कबूतर, कपि आदि प्राणीओं को भी समाधि हो जाती।
श्रीजी की पादूका के आवाज को सूनने मात्र से अनेक जन को समाधि होती थी।
अष्टांगयोग जिन्होंने सिद्ध नहीं किया था ऐसे साधुओं को स्वयं की छडी देकर वे सूचन करतेकि छडी के एक सीरे (छोर) को स्पर्श कराने पर समाधि होगी तथा दूसरे सीरे को स्पर्श से समाधि का निवारण होगा।
समाधि से पुनः वास्तविक स्थिति में आने के पश्चात् वे समाधि में स्वयं को हुए दिव्य अनुभवों की बात करते। उसे सुनकर अन्य लोगों को अंतर में शांति एवं सुख का अनुभव होता था।
7. सहजानंदस्वामी ने खुद मुक्तानंदस्वामी को एक वृक्ष तले रामानंदस्वामी के प्रत्यक्ष दर्शन कराए; तथा उनसे कहलवाया कि समाधिप्रकरण में ढोंग या पाखंड नहीं है। इससे मुक्तानंदस्वामी का समाधिप्रकरण के प्रति संशय निवारण हुआ तथा सहजानंदस्वामी को अपनी श्रद्धा तथा भक्ति अर्पण की। उनके प्रति स्वयं के मन में प्रकट हुई दोषबुद्धि के लिए सहजानंदस्वामी की क्षमा मांगी।
8. मांडवी में निज प्रताप द्वारा सब के समक्ष आत्मानंदस्वामी के पास कुरान के कलमा पढवाए थे।
9. अहमदाबाद में सूबेदार विठ्ठलराव बाबा के यहाँ एक अनपढ भाट के बेटे के पास तथा उमरेठ में हरिभट्ट नामक अबोध, गूंगे ब्राह्मण के पास वेद मंत्रो का पाठ कराया था।
10. स्वामिनारायण अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने एक ही समय पर भिन्न-भिन्न स्थानों में दर्शन देते। घोडो के घुडसाल में भयंकर लूटेरे जोबनपगी को, जिस-जिस घोडे के पास वह जाता वहाँ महाराज के दर्शन होते थे। स्वामिनारायण किसी घोडे को घास डालते तो किसी को पानी पीलाते हों, यह प्रताप देख, जोबनपगी तथा उसके आदमी श्रीहरि के आश्रित हुए तथा चोरी डकैती का धंधा छोडकर सच्चे भक्त बन गए।
11. धार्मिक उत्सव का प्रसंग हो, यज्ञ का प्रसंग हो या किसी भक्त के घर उत्सव हो, उस समय अगर भोजन की कमी हो इतनी बडी संख्या में खानेवाले भक्त आए हों, तो भोजन की कमी नहीं होने देते थे। ऐसे चमत्कार स्वामिनारायण बताते थे।
12. सहजानंदस्वामी के संकल्प से असाध्य रोग मिट जाते थे। उन्होंने भक्त दादाखाचर की बेटी को भयंकर बीमारी में, संतो की तथा स्वयं की प्रसादी का अन्न खिलाकर ठीक किया। लींमली के मूलजी शेठ की आखों के नंबर संकल्प मात्र से दूर किए थे; मूलजी शेठ जीवित रहे तब तक बिना चश्मे के भली प्रकार देख पाते थे।
13. संवत 1869 की साल में अकाल पडनेवाला है, इसकी भविष्यवाणी स्वामिनारायण ने पहले ही कर दी थी। गाँव-गाँव के सत्संगीओं को पत्र लिखवाये थे कि : ‘अनाज तथा चारेपानी का संग्रह करना। उसे खरीदने के पैसे न हों तो कोई भी मिलकत बेचकर भी संग्रह करना।’ भविष्यवाणी के अनुसार वाकई अकाल पडा। जिन्होंने उनके वचन में विश्वास रखकर दानेपानी का संग्रह किया था, वे मुसिबत में नहीं पडे।
14. एक समय श्री गढपूर में श्रीजीमहाराज रात में अक्षर ओरडी में शुकमुनि के पास पत्र लिखवा रहे थे। तब अचानक दिया बूझ गया। अतः शुकमुनि ने कहा, ‘पत्र अधूरा रहा और दिया बूझ गया।’ तुरंत ही श्रीजीमहाराज ने स्वयं के चरणारविंद के अंगूठे से दिये से भी अधिक प्रकाश दिखाया। पत्र पूर्ण नहीं हुआ तब तक वह प्रकाश विद्यमान रहा था।
15. स्वामिनारायण अपनी महत् कृपा की दृष्टि से अपने भक्त के गुण, कर्म, स्वभाव बदल डालते; इतना ही नहीं उनके तथा उनके महान संतो के भगवत संबंध को प्राप्त किए हुए वृक्षों के स्वभाव-गुणों में भी परिवर्तन कर डालते। एसे कई वृक्ष आज भी मौजूद हैं।
16. सहजानंदस्वामी को लाखों लोगों ने उनके जीवनकाल दरमियान ही अवतारी परब्रह्म पुरुषोत्तम के रूप में अपनायें थे। उन्होंने उनके वचनों को त्वरित ग्रहण किया तथा उनके हाथों में अपने नाडी-प्राण सौंप दिये थे।
17. जिन संतो-परमहंसों को लोग भगवान के अवतार के रूप में स्वीकारते हों वे संत-परमहंस जिनकी इष्टदेव के रूप में उपासना करते हों, ऐसे श्री स्वामिनारायण सर्व अवतार के अवतारी हों इसमें क्या आश्चर्य?
18. भगवान के अवतारों ने जैसा सामर्थ्य बताया था वैसा सामर्थ्य तो श्री स्वामिनारायण के भक्त दर्शाते थे, अर्थात् श्री स्वामिनारायण का सामर्थ्य तो अवतारों के सामर्थ्य से कहीं बढकर था।
उपरोक्त हकीकत दर्शाती हैं कि स्वामिनारायण किसी को अपने प्रभाव से प्रभावित करने नहीं, परंतु अपने भक्तों को सहायरूप होने के हेतु तथा केवल कल्याण के हेतु से अपने पूर्ण पुरुषोत्तम स्वरूप की मनुष्यों को प्रतीति कराने, स्वयं का दिव्य सामर्थ्य दर्शित करते थे तथा चमत्कारी लगे ऐसे कार्यकरते थे।