३१. श्री स्वामिनारायण भगवान के प्रादुर्भाव के बारे में शास्त्रों में उल्लेख

भगवान श्री स्वामिनारायण की सर्वोपरिता प्रतिपादन करते शास्त्रों के आधार वचन :

ब्रह्मांडपुराण में वचन है कि -

दत्तात्रेयः कृते युगे त्रेतायां रघुनंदनः ।

द्वापरे वासुदेवः स्यात् कलौ स्वामी वृषात्मजः ॥

‘सत्ययुग में दत्तात्रेय, त्रेतायुग में रघुनंदन, द्वापरयुग में वासुदेव तथा कलिकाल में धर्म के पुत्र स्वामिनारायण प्रकट होंगे।’

पद्मपुराण में कहा है कि -

पाखण्डबहुले लोके स्वामिनाम्ना हरिःस्वयम् ।

पापपंकनिमग्नं तज्जगदुद्धारयिष्यति ॥

‘पाखंड से भरपूर इस लोक में ‘स्वामी’ नामक श्रीहरि स्वयं परमात्मा के रूप में प्रकट होकर पापरूपी पंक में धसे इस जगत का उद्धार करेंगे।’

महाभारत में दर्शाया गया अवतार-अवतारी का भेद -

महाभारत के शांतिपर्व के मोक्षधर्मानुशासन पर्व अ.383 में नरनारायण भगवान नारदजी को पूछते हैं:

अपीदानीं स भगवान् परमात्मा सनातनः ।

श्वेतद्वीपे त्वया दृष्टः आवयोः प्रकृतिःपरा ॥

‘हे नारद, इस समय आपने श्वेतद्वीप में जाकर, नरनारायण, हम दोनों के कारणरूप, सनातन परमात्मा, वासुदेव भगवान के कैसे दर्शन किए?’

इस प्रकार पूछे जाने पर नारदजी नरनारायण भगवान को कहने लगे :

दृष्टो मे पुरुषः श्रीमान् विश्वरुपधरोऽव्ययः ।

दृष्टौ युवां मया तत्र तस्य देवस्य पार्श्वतः ॥

‘हे भगवान! मैने विश्वासरूपधारी ऐसे कांतिमान परम पुरुष अर्थात् वासुदेव भगवान के दर्शन किये; इतना ही नहीं, परंतु आप दोनों को उस स्थान में भगवान के करीब देखा।’

भीष्मपितामह युधिष्ठिर राजा को कहते हैं -

कृते युगे महाराज! पुरा स्वायम्भुवेऽन्तरे ।

नरो नारायणश्चैव हरिः कृष्णः स्वयम्भुवः ॥

‘हे महाराज! पूर्व स्वायंभुव मन्वंतर के सत्ययुग में उस स्वायंभू भगवान ‘वासुदेव’ के चार अवतार हुए थे। उनके नाम नर, नारायण, हरि तथा कृष्ण रखे थे।’

श्रीमद् भागवत में अवतार-अवतारी का भेद -

प्रथम स्कंध के तीसरे अध्याय में ऐसा कहा है कि ‘भगवान ने महदादिक तत्त्व द्वारा वैराज पुरुष का रूप धारण किया तथा वैराज पुरुष द्वारा चौबीस अवतार हुए हैं।’ दशम स्कंध पूर्वार्ध अ.41 में सुदामा बलदेवजी तथा श्रीकृष्ण से कहते हैं कि :

भवन्तौ किल विश्वस्य जगतः कारणं परम् ।

अवतीर्णाविहांशेन क्षेमाय च भवाय च ॥

‘आप श्रीकृष्ण तथा बलदेव दोनों सर्व जगत के कारण हो तथा सर्व विश्व के सुख के लिए तथा वृद्धि के हेतु इस लोक में वासुदेव के अंशरूप से अवतरित हुए हो; अर्थात् आप वासुदेव के अवतार हो।’

विष्णुपुराण के पंचम अंश के 17वे अध्याय में-

अक्रुरजी श्रीकृष्ण के तथा बलदेवजी के दूर से दर्शन कर कहते हैं :

भगवद्वासुदेवांशौ द्विधा योऽयं व्यवस्थितः ॥

‘ये श्रीकृष्ण तथा बलदेवजी दो रूप हैं, जिनमें श्रीकृष्ण हैं वे भगवान वासुदेव के अंशावतार हैं।’

हरिलीलाकल्पतरु स्कंध 3 अ.20 में श्रीहरि मूलजित को कहते हैं -

नैक्यं हि विद्यते धीमन्नवतारावतारिणो ।

वर्तते वास्तवो भेदस्ताराचन्द्रमसोरिवः ॥

‘अवतार - अवतारी में एकता नहीं है, परंतु सितारों एवं चंद्रमा में जैसा भेद है वैसा भेद अवतार-अवतारी में है।’

हरिवाक्यसुधासिंधु तरंग 146 में श्रीहरि ने कहा है कि -

रामकृष्णादयः सर्वैऽवताराः सन्त्यो हि मे ।

पुरुषोत्तमस्य वित्तेरयेतत्सत्यं ब्रवीमि वः ॥

‘पुरुषोत्तम ऐसा मैं, आपको यह सत्य बात कहता हूँ कि रामकृष्णादि सभी अवतार मेरे हैं, ऐसा समझें।’

यस्मिन् सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसे ।

तं वदन्ति परे साक्षात् परिपूर्र्णतमः स्वयम् ॥

‘जो सर्व अवतारों को स्वयं के स्वरूप में लीन करते हैं, तथा पुनः कार्य के लिए प्रकट करते हैं, वे परिपूर्ण एवं स्वयं साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं।’

टिप्पणी : आगे हमने देखा कि भगवान श्री स्वामिनारायण ने तमाम अवतारों को स्वयं की मूर्ति से प्रकट किये थे तथा पुनः स्वयं के स्वरूप में लीन किये थे। समाधि द्वारा अनेक लोगों को उन्होंने यह दिव्य ऐश्वर्य दृष्टिकृत करवाया था। यही श्री स्वामिनारायण महाप्रभु की सर्वोपरिता है।

हरिलीलाकल्पतरु स्कंध 2 अ.1 में धर्मदेव तथा भक्तिमाता को वायुपुत्र हनुमानजी कहते हैं -

युष्मत्पुत्राद् बिभेत्यस्मात्सर्वलोकभयंकरः ।

कालस्तथेश्वराः सर्वै सन्त्यस्यादेशवर्तिनः ॥

हेतुरेवावताराणामवतारी स्वराट् प्रभुः ।

एषाऽक्षराक्षरपरः कारणानांच कारणम् ॥

‘सर्व लोक को भय देनेवाला काल भी आपके पुत्र से भयभीत होता है; एवं ईश्वर भी आपके पुत्र श्रीहरि की आज्ञा में रहते हैं। आपके यह पुत्र सर्व अवतारों के भी अवतारी स्वराट् प्रभु हैं। क्षर-अक्षर से पर एवं सर्व के कारण के भी कारण हैं।’

स्वामिनारायण भगवान की श्रीमुखवाणी ‘वचनामृत’ क्या कहते हैं, जाँचते हैं -

गढडा अं. प्र. वच. 38 -

‘सर्वोपरी जो पुरुषोत्तम भगवान वे ही दयाकर जीवों के कल्याण हेतु इस पृथ्वी पर प्रकट होकर सभी लोगों के नयनगोचर वर्तित होते हैं तथा आपके ईष्टदेव हैं एवं आपकी सेवा को अंगीकार करते हैं; ऐसे यह प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम भगवान वे अक्षरादिक सर्व के नियंता हैं तथा ईश्वर के भी ईश्वर हैं एवं सर्वोपरिरूप से बरतते हैं। सर्व अवतार के अवतारी हैं, एवं आप सभी को एकांतिक भाव द्वारा उपासना करने योग्य हैं एवं इस भगवान के पूर्व जो अनेक अवतार हुए हैं, वे भी नमस्कार करने योग्य हैं एवं पूजने योग्य हैं।’

लोया वच. 11 -

जैसी भगवान की मूर्ति स्वयं को प्राप्त हुई हो उसी का ध्यान करना चाहिए, पूर्व भगवान के अवतार हो गए उन मूर्ति का ध्यान नहीं करना चाहिए एवं स्वयं को जो भगवान की मूर्ति प्राप्त हुई हो उसके प्रति प्रतिव्रता का प्रण रखना चाहिए।

गढडा म. प्र. वच. 13 -

‘वे अक्षरातीत जो भगवान हैं वे ही सर्व अवतार के कारण हैं, सभी अवतार पुरुषोत्तम से ही प्रकट होते हैं तथा पुनः पुरुषोत्तम में लीन होते हैं। उस तेज में जो मूर्ति है वही यह प्रत्यक्ष महाराज हैं ऐसा समझें उससे तुम्हारा परम कल्याण होगा। इस बात को प्रतिदिन नवीन रखना, परंतु लापरवाही करके भुला मत देना। इस भगवान के स्वरूप की दृढता के बिना तो चाहे कितना ही त्याग रखो, या चाहे कितने ही उपवास करो, किंतु कल्याण के मार्ग की कमी दूर नहीं होगी।’

गढडा म. प्र. वच. 9 -

‘स्वयं को प्राप्त हुआ जो साक्षात् भगवान का स्वरूप, उसे सदा दिव्य साकार मूर्ति एवं सर्व अवतार का कारण अवतारी, ऐसा समझे तथा ऐसा न समझकर निराकार समझे तथा दूसरे अवतार जैसे समझे, तो उसका द्रोह किया कहलाता है। ज्ञानमार्ग तो ऐसा समझना चाहिए की किसी भी प्रकार से भगवान के स्वरूप का द्रोह हो ही नहीं। भगवान की मूर्ति का बल अधिकाधिक रखना चाहिए, जो सर्वोपरी भगवान का स्वरूप है वही मुझे प्राप्त हुआ है।’

गढडा म. प्र. वच. 18

‘अपने इष्टदेव के जन्म से लेकर देहत्याग पर्यंत के चरित्र के शास्त्र, उससे संप्रदाय की पुष्टि होती है। अतः अपने इष्टदेव के चरित्र के शास्त्र को पढना एवं सुनना चाहिए।’

पंचाला वच. 1 -

‘जिस प्रकार भगवान का संबंध अधिक हो ऐसा उपाय करे, उसे बुद्धिमान कहेंगे। पशु के सुख से मनुष्य में अधिक सुख है, उससे राजा का सुख अधिक है, उससे देवता का सुख अधिक है, उससे इन्द्र का सुख अधिक है, उससे बृहस्पति का अधिक, उससे ब्रह्मा का, उससे वैकुंठ के लोक का, उससे गोलोक का सुख अधिक है तथा उससे भी भगवान के अक्षरधाम का सुख अति अधिक है।’

अहमदाबाद वच. 7 -

इस वचनामृत में श्रीजीमहाराज बताते हैं कि, ‘सभी ब्रह्मांडों की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का कर्ता भी मैं ही हूँ तथा मेरे तेज से अनंत ब्रह्मांड के असंख्य शिव, असंख्य ब्रह्मा, असंख्य कैलास, असंख्य वैकुंठ तथा गोलोक, ब्रह्मपुर तथा असंख्य करोडों दूसरी भूमिका वे सभी प्रकाशित हैं और फिर मैं कैसा हूँ? तो मेरे पैर के अंगूठे से पृथ्वी को डिगाउँ तो असंख्य ब्रह्मांड की पृथ्वी डिगने लगती है तथा मेरे तेज से सूर्य, चंद्र, सितारें आदिक तेजोमय हैं। ऐसा मैं मुझमें यह समझकर निश्चय करे तो मैं भगवान, मुझमें मन स्थिर हो तथा किसी काल में व्यभिचारी न हो तथा जो जीव मेरी शरण में आए हैं तथा आएँगे तथा एसा समझेंगे उन सभी को मैं सर्वोपरि ऐसा मेरा धाम है उसकी प्राप्ति कराऊँगा।’

इस प्रकार श्री स्वामिनारायण ने स्वयं ही स्पष्टरूप से घोषित किया है कि ‘स्वयं अवतारों के भी अवतारी हैं; अवतार का कारण भी स्वयं ही हैं।’