२७. देशविदेश के समर्थ तत्त्वचिंतक एवं महापुरुष की दृष्टि से श्री स्वामिनारायण एवं स्वामिनारायण धर्म

1. भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी ने कहा था कि :

‘हिंदुस्तान में अनेक धर्म हैं, किंतु स्वामिनारायण धर्म प्रशंसनीय, शुद्ध एवं आकर्षक है। मुझे इस धर्म के प्रति अति आदर है।’

2. सरदार वल्लभभाई पटेल, भारत के भूतपूर्व-गृहमंत्रीने टिप्रणी की है कि :

‘स्वामी श्री सहजानंदजी एवं श्री स्वामिनारायण धर्म के साधुओं के पवित्र जीवन से महागुजरात में सहकार की सौरभ प्रसरी थी। अनेक सामान्य मनुष्यों के तथा पिछडी जाति के बिनशिक्षित मनुष्यों के जीवन को पशुकोटी से उपर लाकर उन्हें संस्कारी बनाने में इस धर्म का योगदान महत्त्वपूर्ण है।’

3. आचार्य श्री आनंदशंकर ध्रुव कहते हैं कि:

‘स्वामी श्री सहजानंद के उपदेश से गुजरात, काठियावाड की अनेक क्रुर एवं लडायक जाति कोमल तथा शांत हुई है तथा प्रभु की ओर मुडी है। ‘वचनामृत’ नामक उनके उपदेशवचनों का जो संग्रह है, वह बहुत ही गंभीर, मनन करने योग्य तथा ज्ञान एवं उपासना के निरुपण से भरपूर है।’

4. गुजरात के जानेमाने साहित्यकार कनैयालाल मुनशी बताते हैं कि :

‘गुजरात के महान ज्योतिर्धरों में स्वामी श्री सहजानंदजी का स्थान अग्रस्थान में रहा है।’

5. न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे ने टिप्पणी की है कि :

‘स्वामी श्री सहजानंद मध्यकालीन हिंदु धर्म के आखरी सुधारक थे।’

6. श्री गुलजारीलाल नंदा, भारत के भूतपूर्व गृहमंत्री अपने स्वानुभव की टिप्पणी करते हुए कहते हैं :

‘स्वामिनारायण द्वारा प्रदातित अहिंसा का सिद्धांत जगत के सर्व अहिंसा के सिद्धांतो में मुझे श्रेष्ठ लगा है। उनके इस असाधारण सिद्धांत ने मुझे इतनाप्रभावित किया है कि मेरा स्वयं का उसमें रुपांतर हो गया है।’

7. गुजराती भाषा के विवेचक श्री विजयराय कल्याणराय वैद लिखते हैं कि :

‘महागुजरात में तीस वर्ष के धर्मचक्रप्रवर्तनरूप से सार्थक होता हुआ स्वामिनारायण का अवतारकार्य जगतइतिहास में विरल है; गुजरातइतिहास में अद्वितीय एवं विप्लवकारी है।’

8. मनु सूबेदार प्रमुख, सस्ता साहित्य वर्धक कार्यालय, कहता है कि :

‘स्वामी सहजानंद ने एक विकट घडी में आकर प्रजाजीवन में अदभूत क्रांति प्रकट की है। बिलकुल निम्न स्तर तक उन्होंने सत्य एवं सदाचार का अमृत सिंचन किया है। किसी व्यक्ति-विशेष के हाथों ही यह हो सकता है। स्वामी सहजानंद एक महान सुधारक हैं, धर्मचक्र के प्रवर्तक हैं तथा उज्ज्वल राष्ट्रविधान के पयगंबर हैं।’

9. श्री महेंदीनवाझ जंग, भूतपूर्व गवर्नरश्री, गुजरात राज्य, लिखते हैं कि :

‘स्वामिनारायण के उपदेश पानी के बहते प्रवाह की सदृश स्वच्छ एवं निर्मल तथा सभी को उपयोगी हों वैसे हैं। मनुष्य कोई भी ज्ञाति या धर्म का हो, किंतु उसे सत्य का दर्शन कराने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, जो ऐसा दिव्य प्रकाश देता है वह भगवान या पयगंबर होता है।’

10. समर्थ चिंतक श्री किशोरलाल मशरुवाला ने श्री स्वामिनारायण के अवतारी कार्य का मूल्यांकन करते हुए लिखा है :

‘जिस समय कच्छ, गुजरात तथा काठियावाड में अंधकार छा रहा था, उस समय श्री सहजानंदस्वामी ने लगभग 30 वर्ष तक अविरत परिश्रम लेकर लोगों को शुद्ध मार्ग पर पथदर्शित किया; अपने प्रताप से अनेकों के हृदय को प्रकाशित किया। उँच, नीच, हिंदु, अहिंदु सभी जाति को अपना संदेश पहुँचाने के लिए उन्होंने जो योजक बुद्धि खर्च की, जोखिम उठाए तथा साधक तैयार किए वे बुद्धदेव की स्मृति कराते हैं। स्वयं के काल में प्रसिद्ध पुरुषों में सहजानंद स्वामी सबसे महान थे। उस काल के मुमुक्षुओं को पुरुषोत्तम के रूप में उपासना करने योग्य थे। अगर अवतार पृथ्वी पर होते हैं तो उन्हें अवतार की संज्ञा बेशक दी जा सकती है।’

11. महाकवि न्हानालाल बताते हैं कि :

‘श्रीजी ने प्रवर्तित धर्ममार्ग की लाक्षणिकता का आकलन कैसे हो? वह धर्ममार्ग है आचारस्वच्छता का, विधिस्वच्छता का, उपासनास्वच्छता का, व्यवहारस्वच्छता का तथा सर्वदेशीय आंतरबाह्य स्वच्छता का। भंग, गाँजा, तंबाकु आदि त्याग कराकर श्रीजी ने गृहस्थों के जीवन को निर्मादक बनाया, रंगे हुए कमंडल तोड श्रीजी ने संतो को निर्मोही बनाया, स्त्री-पुरुषों के लिए अलग-अलग दर्शन व्यवस्था स्थापितकर श्रीजीने देव मंदिरों को पवित्र बनाये, पंच नियम धारण करवाकर अनुयायीओं को आचारशुद्ध किया, शिक्षापत्री देकर व्यवहारशुद्ध किया, वचनामृत सुनाकर ज्ञानशुद्ध किया, पर्वोत्सव-धार्मिक उत्सव मनाकर जनता में उत्साह छलकाया, भव्य मंदिरों, अहिंसात्मक यज्ञों, विशुद्ध पूजाविधान, पालना-हिंडोला, वसंतपंचमी, जन्माष्टमी आदि वैष्णवी महोत्सव, जलझीलनी (एकादशी) तथा रामनवमी के समारंभों का आयोजनकर जनता को जागरुक किया। परिव्राजक की सदृश गाँव-गाँव जाकर जनता को उमंगी बनाया, भावरूप हिंडोले में झूलकर प्रजा को उत्साह पान करवाया, संसार को सजीवन किया। स्वामिनारायण ने क्या किया यह इतिहास प्रश्न का उत्तर एक ही सूत्र में पूछें तो यही है कि श्रीजीमहाराज ने गुजरात को सरयू नीर से धोकर ब्रह्मआर्द किया, नवयुग के प्रभात के स्वामिनारायण प्रभातसूर्य थे।’