५. वनविचरण एवं भारत परिभ्रमण
अब घनश्याम नीलकंठ के नाम से पहचाने जाने लगे। निर्भय नीलकंठ ने 7 वर्ष, 1 माह और 11 दिन हिमालय के घोर वन में तथा पूरे भारत के तीर्थों में पदयात्राकर विचरण किया। वन में गोपाल नामक योगी के पास किशोर नीलकंठ ने अष्टांग योग सिद्ध किया तथा हठयोग की सर्व कलाओं को सीख लिया। वनवास के दरमियान नीलकंठ ने अति कठिन तपश्चर्याकर शरीर को सूखा डाला, इस हद तक कि शरीर में कहीं चोट लगे तो घाव से पानी की बूँद निकलती, किंतु रुधिर तो निकलता ही नहीं। एसी स्थिति में भी नीलकंठ सदैव स्वस्थ एवं तेजस्वी लगते थे।
वनविचरण और भारतपरिभ्रमण दरमियान प्रतापी नीलकंठ ज्ञानोपदेश कर हजारों साधुसन्यासीओं को सन्मार्ग पर लाए। उनके दिव्य प्रभाव मात्र सेअनेक जनों को उनके पापकर्मो का त्याग करवाकर उन्हें दैवी बनाये। अनेक मुमुक्षु जीवों के जीवन परिवर्तित कर डाले। अवतारी पुरुष के लिये क्या अशक्य है?
मानव-संस्कृति का समग्र इतिहास दृष्टिगोचर करने से हमें प्रतीत होता है कि नीलकंठवर्णी के वनविचरण की समग्र घटना अद्भुत एवं अद्वितीय है। नीलकंठवर्णी अपने विचरण एवं परिभ्रमण को ज्यों-ज्यों आगे बढाते हैं त्यों-त्यों उनकी असाधारणता के दर्शन हमें होते हैं।